देश के युवा अपनी रिटायरमेंट प्लानिंग को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं हैं. आदित्य बिड़ला सन लाइफ पेंशन फंड मैनेजमेंट की एक रिपोर्ट से ये बात सामने आई है. रिपोर्ट कहती है कि 30 साल से कम उम्र के युवा निवेशकों में इक्विटी यानी शेयर बाजार में निवेश का जोखिम लेने की अच्छी-खासी क्षमता है, लेकिन नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में उनकी भागीदारी अब भी कम है.
रिपोर्ट के FY26 के आंकड़ों के मुताबिक ये युवा अपने NPS के पैसे का सबसे बड़ा हिस्सा इक्विटी में लगाते हैं, लेकिन कुल NPS खाताधारकों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 20% ही है. जो शुरुआती उम्र में ही रिटायरमेंट की प्लानिंग करने के मामले में एक बड़े अंतर को दिखाता है. मतलब ये कि युवा लोग रिस्क लेने के लिए तो तैयार हैं, लेकिन उनमें से कई अब भी रिटायरमेंट के लिए निवेश करने में देरी कर रहे हैं.
ABSL के मुताबिक, भारत की औसत उम्र लगभग 28 वर्ष है, जो इसे दुनिया की सबसे युवा अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनाती है. इसके बावजूद NPS में सबसे ज़्यादा भागीदारी 30 से 60 वर्ष के आयु वर्ग की है, जो कुल खाताधारकों का 76% है. जब तक कई लोग रिटायरमेंट की प्लानिंग शुरू करते हैं, तब तक वे लंबे समय के निवेश का सबसे बड़ा फायदा, यानी ‘समय’खो चुके होते हैं.
‘युवा निवेशकों के बीच इक्विटी को लेकर रुझान’
30 साल से कम उम्र के निवेशक अपने NPS के पैसे का करीब 61% हिस्सा इक्विटी में लगाते हैं, जो सभी आयु वर्गों में सबसे ज़्यादा है. ये साबित करता है कि युवा लोग लॉन्ग टर्म में वेल्थ क्रिएशन के लिए बाजार से जुड़े निवेशों में पैसा लगाने को तैयार हैं. हालांकि, रिस्क लेने की इस क्षमता के बावजूद, NPS में उनकी कुल भागीदारी काफी कम है. वे लंबे समय के लिए बाजार से जुड़े निवेशों में पैसा लगाने में काफी सहज महसूस करते हैं.
इतिहास बताता है कि इक्विटी में निवेश ने लंबे समय में रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड बनाया है, खासकर उन निवेशकों के लिए जिनके पास निवेश करने के लिए 25 से 35 साल का लंबा समय है.
हालांकि, रिस्क लेने की इच्छा होने के बावजूद, युवाओं की इस व्यवस्था में भागीदारी और लगातार निवेश करने की आदत अभी भी काफी कम है.
‘अलग-अलग आयु वर्ग में निवेश का तरीका’
अलग-अलग आयु वर्ग के निवेश करने के तरीके से पता चलता है कि उम्र के साथ रिटायरमेंट प्लानिंग का व्यवहार कैसे बदलता है. 30 साल से कम उम्र के निवेशकों का NPS में किया जाने वाला औसत मंथली निवेश करीब 2,500 रुपये है, जो 55-60 वर्ष की उम्र वाले लोगों की ओर से किए जाने वाले 18,000 रुपये के निवेश से काफी कम है.
हालांकि ये फर्क आंशिक रूप से कमाई के अंतर को दिखाता है, क्योंकि शुरुआती दौर में युवाओं की कमाई आमतौर पर कम होती है और उनके पास खर्च करने के लिए ‘एक्स्ट्रा मनी’ या ‘डिस्पोजेबल इनकम; कम होते हैं. इससे ये भी पता चलता है कि युवाओं में रिटायरमेंट की प्लानिंग को आगे टालने की आदत भी है.
ये देरी लॉन्ग टर्म में वेल्थ क्रिएशन को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है, क्योंकि रिटायरमेंट के लिए किया जाने वाला निवेश पूरी तरह कंपाउंडिंग की ताकत पर निर्भर करता है. लंबे समय तक लगातार निवेश की गई छोटी सी रकम भी भविष्य में रिटायरमेंट के लिए एक बहुत बड़ा फंड तैयार कर सकती है.
उदाहरण के लिए, 25 साल की उम्र से हर महीने ₹2,500 का निवेश करने वाला व्यक्ति, 40 की उम्र में ज़्यादा पैसों के साथ निवेश शुरू करने वाले व्यक्ति की तुलना में अंत में कहीं बड़ा फंड तैयार कर सकता है.
रिटायरमेंट प्लानिंग व्यवहार से जुड़ी समस्या
फाइनेंशियल प्लानर्स का मानना है कि भारत में रिटायरमेंट प्लानिंग की समस्या लोगों के व्यवहार से जुड़ी है. कई लोग घर खरीदने, गाड़ी लेने या इमरजेंसी फंड बनाने जैसे शॉर्ट-टर्म लक्ष्यों को पहले अहमियत देते हैं, जबकि रिटायरमेंट को ये मानकर तवज्जो नहीं देते क्योंकि उन्हें लगता है कि ये तो अभी बहुत दूर की बात है, जब होगा तब देखी जाएगी.
NPS स्ट्रक्चर लॉक-इन और अनुशासित निवेश के ज़रिए इस चुनौती से निपटने की कोशिश करता है. चूंकि कुछ खास हालातों को छोड़कर रिटायरमेंट की उम्र तक इससे पैसे निकालने पर पाबंदी होती है, इसलिए यह स्कीम बाजार के उतार-चढ़ाव या लाइफस्टाइल से जुड़े खर्चों के दौरान जल्दबाजी में पैसे निकालने की आदत पर लगाम लगाती है.
महिलाओं की भागीदारी अब भी कम है
NPS में हमेशा से ही पुरुषों को बोलबाला रहा है, जो कि एक बड़ी चिंता है. इसलिए NPS खाताधारकों में महिलाओं की संख्या सिर्फ 23% है, ये स्थिति तब है जब आमतौर पर महिलाओं की जीवन प्रत्याशा पुरुषों से ज़्यादा होती है, यानी वो पुरुषों के मुकाबले ज्यादा जीती हैं. इसके अलावा, करियर ब्रेक, कम कमाई और कम पेंशन कवरेज के कारण उन्हें रिटायरमेंट के बाद ज़्यादा आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है. महिलाओं की कम भागीदारी परिवारों की रिटायरमेंट सुरक्षा पर बड़ा असर डाल सकती है, खासकर शहरी मिडिल-क्लास परिवारों में जहां दोनों पति-पत्नी की कमाई का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है.

