8th Pay Commission: DA, DR कैलकुलेशन का तरीका सही नहीं! कर्मचारियों के फेडरेशन ने की नए फॉर्मूले की मांग

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8th Pay Commission

केंद्र सरकार के कर्मचारियों (Central Government Employees) को मिलने वाले महंगाई भत्ता (DA) और पेंशनर्स को मिलने वाले महंगाई राहत (DR) की कैलकुलेशन जिस फॉर्मूले से की जाती है, ऑल इंडिया डिफेंस एम्पलॉयीज फेडरेशन (AIDEF) ने उसे बदलने की मांग की है. AIDEF ने 8वें वेतन आयोग को अपना दूसरा पूरक ज्ञापन (supplementary memorandum) सौंपा है, जिसमें DA और DR की कैलकुलेशन में इस्तेमाल किए जाने वाले तरीके (methodology) की व्यापक समीक्षा करने की मांग की है.

क्या है फेडरेशन की मांग?

फेडरेशन (AIDEF) का कहना है कि मौजूदा ‘इंफ्लेशन इंडेक्स’ बढ़ती हुई चीजों की महंगाई को सही तरीके से नहीं दर्शाता है, जिसका सामना सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स कर रहे हैं. मौजूदा समय में महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) में होने वाले संशोधन इंडस्ट्रियल वर्कर्स के लिए ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI-IW) पर आधारित होते हैं. ये एक ऐसा पैमाना है जो ये देखता है कि बाजार में महंगाई कितनी बढ़ी है, ताकि कर्मचारियों की ‘क्रय शक्ति’ या खरीदने की क्षमता कम न हो और वे महंगाई का सामना कर सकें.

मगर, अपने दूसरे ज्ञापन में AIDEF ने 8वें वेतन आयोग से कहा है कि इस पुरानी पद्धति में कई सारी बड़ी कमियां मौजूद हैं, जिसकी वजह से कर्मचारियों और पेंशनर्स के खर्च के बदलते तौर-तरीकों का सही-सही पता नहीं चलता है. यानी आज के समय में जीवन जीने के लिए जो असली खर्च उठाना पड़ रहा है, ये फॉर्मूला उसका सही अंदाज़ा नहीं लगा पाता.

फेडरेशन को मौजूदा इंफ्लेशन इंडेक्स में क्या दिक्कतें दिखती हैं, इसको भी समझिए. फेडरेशन ने मुख्य रूप से दो बातें समझाने की कोशिश की है.

सामानों की बास्केट लिस्ट

फेडरेशन का कहना है कि सरकार ने साल 2022-23 में महंगाई नापने के लिए सामानों की एक नई लिस्ट (बास्केट) बनाई, जिसे रिवाइज्ड कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स बास्केट कहा गया. इस लिस्ट में सरकार ने ये मान लिया कि एक आम आदमी अपनी कुल कमाई का केवल 36.75% ही खाने-पीने की चीजों (Food & Beverages) पर खर्च करता है. जबकि बाकी का बड़ा हिस्सा वो घर के किराए, मेडिकल खर्चों, ट्रांसपोर्ट, मोबाइल-इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं पर खर्च करता है.

साल 2012 में सरकार मानती थी कि एक कर्मचारी अपनी कमाई का 45.86% हिस्सा खाने-पीने पर खर्च करता है, जिसे 2022-23 की समीक्षा में घटा दिया गया. नई लिस्ट में सरकार ने घर के किराए, मेडिकल, ट्रांसपोर्ट, मनोरंजन और इंटरनेट-डिजिटल सेवाओं को ज़्यादा वेटेज दिया है.

फेडरेशन का कहना है कि असल जिंदगी के खर्चे इससे बिल्कुल अलग हैं. महंगाई की नई बास्केट में उन चीजों को ज़्यादा अहमियत दी गई है जिनकी कीमतें आमतौर पर स्थिर रहती हैं. इसके मुकाबले, खाने-पीने की चीजों और मौसमी उत्पादों जैसे फल और सब्जियां, जिनके दाम बहुत तेजी से ऊपर-नीचे होते हैं, इसको इसमें कम आंका गया है.

असल खर्चे और इंडेक्स में फर्क

फेडरेशन का कहना है कि कम सैलरी वाले कर्मचारियों या पेंशनर्स उनकी जिंदगी ऐसी नहीं होती है. क्योंकि वे अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा खाने-पीने की चीजों, दवाइयों, अस्पताल के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और मकान के किराए जैसी बेहद जरूरी चीजों पर ही खर्च कर देते हैं. उनके पास मोबाइल- इंटरनेट या सुख-सुविधाओं पर खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे बचते ही नहीं हैं. इसलिए उनके निजी खर्चे और जो आधिकारिक इंडेक्स में दिखाया गया है, उसमें जमीन आसमान का फर्क है.

अगर इन ज़रूरी चीज़ों की कीमतें महंगाई के मुकाबले ज़्यादा तेज़ी से बढ़ती हैं, तो महंगाई राहत (DR) पेंशनर्स की खरीदने की क्षमता को बचाने में नाकाम साबित होगी. इससे उनके बुढ़ापे में बहुत ज़्यादा आर्थिक दबाव बढ़ जाता है.

फेडरेशन के सुझाव क्या हैं?

इस दिक्कत से बचने के लिए फेडरेशन ने आयोग को कुछ सुझाव दिए हैं. फेडरेशन का कहना है कि कर्मचारियों के लिए अलग से महंगाई का पैमाना बनाया जाए, यानी सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए एक अलग ‘लिविंग इंडेक्स’ (Cost-of-living index) बनाया जाए, जो केवल उनके असली खर्चों और ज़रूरतों को ध्यान में रखकर महंगाई को नापे.

फेडरेशन ने खासतौर पर पेंशनर्स को ध्यान में रखते हुए आयोग के सामने प्रस्ताव रखा है कि सरकार जब भी आगे सैलरी या पेंशन बढ़ाए, तो उसमें बुजुर्गों की देखभाल, दवाइयों और इलाज पर होने वाले भारी खर्च को खास तौर पर शामिल किया जाए.

साथ ही, कर्मचारियों के खर्च करने के तौर-तरीकों में जो बदलाव आया है, उसे फिटमेंट फैक्टर में जोड़ा जाए, ताकि सैलरी और पेंशन में अच्छी बढ़ोतरी हो सके.

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