8 महीने के निचले स्तर तक फिसलने के बाद सोने में बाज़ी एक बार फिर से पलट गई है. इसी हफ्ते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोना 4,000 डॉलर के नीचे चला गया था, अब इसमें लौटी तूफानी तेज़ी ने सोने की कीमतों को 4,200 डॉलर प्रति आउंस के ऊपर पहुंचा दिया है. सिर्फ दो दिनों में ही सोने की कीमतों में 200 डॉलर प्रति आउंस से ज्यादा का उछाल देखने को मिला है.
घरेलू बाज़ार में भी यही हाल है, MCX पर सोना अगस्त वायदा इसी हफ्ते 1.4 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम तक लुढ़क गया था. मगर, 3 जुलाई की सुबह 9:30 बजे खबर लिखे जाने तक ये तकरीबन 2,000 रुपये प्रति 10 ग्राम की ज़ोरदार तेज़ी के साथ 1,47,730 रुपये पर ट्रेड कर रहा था. सिर्फ तीन दिनों में ही ये सोने में 7,000 रुपये से ज्यादा का उछाल देखने को मिला है. 2 जुलाई को सोना वायदा 1,45,758 रुपये पर बंद हुआ था, 3 जुलाई को इसने 1,47,977 रुपये का इंट्राडे हाई बनाया है. यानी एक दिन में ही ये 2,200 रुपये प्रति 10 ग्राम से ज्यादा मजबूत हुआ है.
सोने की कीमतों में तेज़ी क्यों आई
अब सवाल ये है कि सोने की कीमतों में अचानक ये उफान आया कहां से, रातों रात ऐसा क्या हो गया कि जो सोना जून के महीने में करीब 11.5% तक टूटा, वो अब अचानक ही सरपट दौड़ने लगा है.
देखिए, सोना कभी किसी एक फैक्टर पर नहीं चलता, कभी ब्याज दरें, कभी कच्चा तेल, कभी आर्थिक स्थितियां. ये सारे फैक्टर्स एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं. इस बार जिस फैक्टर की वजह से सोना दौड़ा है वो है अमेरिका के रोज़गार और बेरोज़गारी के आंकड़े.
2 जुलाई को अमेरिका के लेबर डिपार्टमेंट ने नॉन-फार्म पेरोल के डेटा जारी किए. जिसमें सामने आया कि पिछले महीने सिर्फ 57,000 ही नौकरियां जोड़ी गईं. जबकि इकोनॉमिस्ट का अनुमान था कि 1,10,000 नौकरियां जोड़ी जाएंगी, मतलब उम्मीद से आधी नौकरियां ही जोड़ी गईं. ये पिछले चार महीनों में नौकरी बढ़ने की सबसे धीमी रफ्तार है. ये चिंता बढ़ाने वाली बात इसलिए है क्योंकि इसके पिछले डेटा में निगेटिव रिवीजन किया गया है. अप्रैल और मई के नौकरी के आंकड़ों को भी 74,000 से कम कर दिया गया है, मतलब ये कि पहले बाजार जितना मजबूत दिख रहा था, असल में उतना था ही नहीं.
बेरोज़गारी दर घटी, लेकिन…
ये तो रही रोज़गार की बात, अब बेरोज़गारी के डेटा देखिए – अमेरिका में बेरोजगारी दर 4.3% से घटकर 4.2% पर आ गई. आपको लगेगा ये तो अच्छी बात है, लेकिन इसकी वजह उतनी अच्छी नहीं है. काम करने की उम्र वाले करीब 7,20,000 लोग लेबर मार्केट से ही बाहर हो गए हैं. जिसकी वजह से ये डेटा कम दिख रहा है, क्योंकि इन लोगों ने जॉब ढूंढना ही बंद कर दिया है.
लोग जिस रफ्तार से लेबर मार्केट से बाहर हुए, उसकी वजह से लेबर पार्टिसिपेशन रेट गिरकर 61.5% पर आ गया, ये कोविड महामारी, मार्च 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है.
फेडरल रिजर्व के लिए जॉब्स डेटा पॉलिसी बनाने के लिए सबसे ज़रूरी आंकड़ों में से एक होता है. ये आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि अमेरिका की इकोनॉमी इस वक्त अच्छी स्थिति में नहीं है. इसका असर ये होगा कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाने के बारे में विचार भी नहीं करेगा, बल्कि उसे ब्याज दरें घटाने के बारे में सोचना पड़ेगा. मतलब ये कि फेड के लिए इस साल ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना संभव नहीं होगा, जबकि जून की पॉलिसी में अनुमान जताया जा रहा था कि इस साल एक बढ़ोतरी होगी. इस साल ब्याज दरें नहीं बढ़ना सोने के लिए अच्छी खबर होगी और अगर घटीं तो और ज्यादा अच्छी खबर होगी, क्योंकि जब ब्याज दरें घटेंगी तो सोने की डिमांड बढ़ेगी और कीमतें ऊपर जाएंगी.
डॉलर कमज़ोर, बॉन्ड यील्ड फिसली
कमज़ोर जॉब्स डेटा के आने के बाद अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में भी कमजोरी देखने को मिली है यानी डॉलर कमजोर हुआ है. डॉलर इंडेक्स 13 महीने की ऊंचाई से फिसलकर अब 100.77 पर आ गया. साथ ही अमेरिका की 10-साल की बॉन्ड यील्ड भी कमजोर हुई है. अब ये दोनों ही बातें सोने के पक्ष में जाती हैं. डॉलर कमजोर होता है तो विदेशी निवेशकों के लिए सोने में निवेश करना सस्ता पड़ता है. क्योंकि सोना खरीदने के लिए डॉलर की ज़रूरत होती है. बॉन्ड यील्ड घटती है तो निवेशक सोने की तरफ दौड़ते हैं, क्योंकि सोना एक नॉन-यील्ड एसेट हैं यानी ब्याज नहीं देता लेकिन भविष्य में अच्छा रिटर्न देने की उम्मीद देता है.
क्रूड $70 के नीचे
सोने की कीमतों पर कच्चे तेल का भी बड़ा असर होता है, क्योंकि कच्चे तेल का सीधा ताल्लुक महंगाई से होता है. अगर कच्चा तेल महंगा हुआ तो महंगाई का ग्राफ भी बढ़ेगा. महंगाई बढ़ी तो उसे काबू में करने के लिए फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ती है. ब्याज दरें बढ़ीं तो सोने की डिमांड घटेगी और कीमतें भी गिरेंगी. लेकिन इस वक्त 3 जुलाई को कच्चा तेल अमेरिका-ईरान की जंग के पहले वाले स्तर पर पहुंच गया है. ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर प्रति बैरल के नीचे फिसल गया है. यानी महंगाई का खतरा कम हुआ है. जो सोने की कीमतों को सपोर्ट करेगा.
यानी अगर देखा जाए तो कुल मिलाकर जितने भी फैक्टर्स हैं, वो सोने के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं. इसलिए सोने की कीमतें ऊपर की ओर भाग रही हैं. अब इंतज़ार सिर्फ फेडरल रिजर्व की बैठक के नतीजों का है, जिसका ऐलान 28-29 जुलाई की फेड बैठक के बाद होगा. फेड चेयरमैन केविन वॉर्श का कोई भी इशारा अगर ब्याज दरों में कटौती की ओर होता है तो सोने की कीमतें और तेजी के साथ बढ़ सकती हैं.

