डिपॉजिटरीज़ CDSL और NSDL को मार्केट रेगुलेटर SEBI की ओर से बड़ी राहत मिली है. SEBI ने इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड (IPF) से हुई आय के पैसों के इस्तेमाल के नियमों को थोड़ा ढीला कर दिया है. अब ये डिपॉटरीज़ इस पैसे कुछ हिस्से का इस्तेमाल अपने प्रशासनिक कामों (administrative work) के लिए कर सकेंगी. ये नया नियम 1 सितंबर, 2026 से लागू होगा.
पहले नियम क्या था?
इस खबर को समझने से पहले ये जान लीजिए कि इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड क्या है. डिपॉजिटरीज के पास एक इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड होता है. इस फंड का मकसद निवेशकों के हितों की सुरक्षा करना है यानी एक तरह से ये निवेशकों के लिए सेफ्टी फंड है. मान लीजिए कुछ ऐसी घटना हो जाती है, जिससे निवेशकों को मुआवज़ा देना पड़ जाए तो इसी फंड के पैसों का इस्तेमाल किया जाता है.
इस फंड के पैसों को डिपॉजिटरीज सरकारी बॉन्ड्स, बैंक डिपॉजिट्स जैसी सुरक्षित निवेशों में रखती है, जिससे ब्याज आय होती या निवेश आय होती है. नियम के मुताबिक IPF के पैसों के निवेश पर जो भी आय होती है, उस 100% पैसे को वापस IPF में ही डाल दिया जाता है, जिससे ये बढ़ता रहता है. इस निवेश आय के एक रुपये का भी इस्तेमाल डिपॉजिटरीज अपने खर्चों के लिए नहीं ले सकती हैं.
अब क्या बदला है?
डिपॉजिटरीज़ का कहना है कि उनके अपने खर्चे हैं, जैसे फंड का ऑडिट करवाना हो, प्रशासनिक खर्चे और IPF के मैनेजमेंट से जुड़े दूसरे तमाम खर्च हैं. इसलिए IPF के निवेश से हुई आय के कुछ पैसों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाए. SEBI का कहना है कि डिपॉजिटरीज की मांग की समीक्षा की गई, और नियमों में हल्की ढील देने का फैसला किया गया. इसलिए रेगुलेटर ने IPF की सालाना आय का अधिकतम 5% प्रशासनिक और कानूनी खर्चों पर इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी. बाकी 95% आय को इन्वेस्टर्स प्रोटेक्शन फंड में वापस डालना होगा.
इसको उदाहरण से समझिए – मान लीजिए कि IPF में 1,000 रुपये पड़े हैं. इसको निवेश किया तो 100 रुपये की आय हुई. पुराने नियम के मुताबिक ये पूरे 100 रुपये IPF में चले जाते हैं. मगर, नए नियम के बाद इस 100 रुपये में से 5% हिस्सा डिपॉजटरीज IPF के मैनेजमेंट और दूसरे एडमिनिस्ट्रेटिव खर्चों के लिए निकाल सकती है, यानी कि 5 रुपये. बाकी 95 रुपये IPF में जमा कर दिए जाएंगे.
खर्च 5% से ज्यादा हुआ तो…
SEBI ने इन्वेस्टर्स प्रोटेक्शन फंड के पैसों को सुरक्षित रखने के लिए इसमें एक शर्त भी रखी है, ताकि डिपॉजिटरीज इस छूट का गलत तरीके से फायदा न उठाएं. अगर डिपॉजिटरीज के ख़र्चे 5% से ज्यादा हो गए, तो बाकी पैसों का इंतज़ाम उन्हें खुद अपने आप ही करना होगा, वो अतिरिक्त पैसे नहीं ले सकते. अगर खर्चे 5% से कम में ही निपट गए तो बची हुई रकम को वापस से इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड में डालना होगा, डिपॉजिटरीज बची हुई रकम को अपने पास नहीं रख सकतीं.
इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड को मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस मैनेज करते हैं, जैसे – जैसे NSE, BSE, NSDL और CDSL. रेगुलेटर की ओर से दी गई ये ढील डिपॉजिटरीज को अपने खर्चों को पूरा करने के लिए फंड की समस्या को दूर करेगी, साथ ही इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड की रकम भी समय के साथ बढ़ती रहेगी.
SEBI ने मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (MIIs) को निर्देश दिया है कि इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड के नए नियमों को लागू करने के लिए सभी जरूरी तकनीकी बदलाव करें और एक सिस्टम तैयार करें. साथ ही अगर जरूरी हो तो अपने नियमों, रेगुलेशंस को भी बदलें.

