Explained: क्रूड गिरता है, फिर भी पेट्रोल-डीज़ल क्यों नहीं सस्ता होता? समझिए पूरा खेल

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Why Don't Petrol and Diesel Prices Fall Even When Crude Oil Prices Drop? here is the game

क्या आपके मन में भी कभी ये सवाल कौंधा है कि जब पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें डीरेगुलेट हैं, यानी बाज़ार के हवाले हैं तो जब क्रूड सस्ता होता है तो पेट्रोल-डीजल क्यों सस्ता नहीं होता है. जैसे – कई मौकों पर कच्चा तेल 120 डॉलर तक पहुंचा और वहां से गिरकर 60-65 डॉलर तक भी आया, लेकिन इन दोनों ही मौकों पर न तो पेट्रोल-डीजल के दाम बहुत बढ़े और न ही कम हुए- कुल मिलाकर दाम ज्यादातर मौकों पर स्थिर ही रहते हैं.

तो सवाल लाजमी है कि अगर कीमतें सच में इंटरनेशनल मार्केट से तय होती हैं, तो यह “वन-वे” रिश्ता क्यों दिखता है? और डीरेगुलेशन की वजह से क्या सरकार सच में इसमें बिल्कुल भी दखल नहीं देती?

इस सवाल का जवाब बहुत सीधा है, लेकिन उसे समझने के लिए पहले ये जानना होगा कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय कैसे होती है. भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत किसी एक फैक्टर से नहीं, बल्कि कई परतों को जोड़कर बनता है. मोटे तौर पर एक लीटर की कीमत में कई हिस्से होते हैं.

कच्चे तेल की लागतएक्साइज ड्यूटीVATकमीशन
रिफाइनिंग और ढुलाई सहित समेत कुल कीमत का ये करीब 35-45% हिस्सा होता हैकेंद्र सरकार पेट्रोल डीजल पर करीब 20-25% की एक्साइज़ ड्यूटी वसूलती हैकेंद्र के साथ साथ सभी राज्य अलग-अलग रेट पर VAT वसूलते हैं जो कि करीब 20-30% होता हैडीलर कमीशन और तेल कंपनियों का मार्जिन भी करीब 5-8% होता है

इन सबको जोड़कर देखा जाए तो कुल कीमत का 50% से 60% हिस्सा सीधे टैक्स का होता है. मतलब ये कि अगर पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर है तो 60 रुपये तो सिर्फ टैक्स देते हैं.
इसका मतलब है कि क्रूड ऑयल सिर्फ “बेस प्राइस” तय करता है, फाइनल रिटेल प्राइस में बड़ा हिस्सा टैक्स, मार्जिन, कमीशन का होता है. जो केंद्र, राज्य सरकारों और कंपनियों की झोली में जाता है.

सवाल नंबर 1- क्रूड सस्ता तो पेट्रोल-डीजल सस्ता क्यों नहीं होता?

तो अब हम अपने मुख्य सवाल पर लौटते हैं कि जब क्रूड सस्ता होता है, पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत क्यों नहीं कम हो जाते. अक्सर तो कम होते भी नहीं हैं. इसके पीछे दो वजहें हैं.

पहली वजह
पहले तो अपने दिमाग से ये गलतफहमी निकाल दीजिए कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में रोज़ाना कच्चे तेल की कीमतों में जो उतार-चढ़ाव होता है, उसी आधार पर हमारे देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कैलकुलेट की जाती हैं. ऐसा बिल्कुल नहीं है. IOC, BPCL, HPCL रोज़ाना सुबह कीमतें अपडेट जरूर करती हैं, लेकिन वो उस दिन के क्रूड प्राइस पर नहीं होता है, बल्कि पिछले 15 दिन या एक महीने की औसत इंपोर्ट लागत के आधार पर होता है.

इसलिए मान लीजिए कि क्रूड आज सुबह अचानक से 5% टूट गया और 75 डॉलर तक आ गया, तो पेट्रोल-डीजल में भी हमें 5% की गिरावट देखने को मिलेगी, ऐसा नहीं है. बल्कि तेल कंपनियां 15 दिन पहले या 30 दिन पहले की कीमत के आधार पर अपनी औसत इंपोर्ट लागत निकालेंगी, उस वक्त हो सकता है कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर रही हो.

दूसरी वजह
कच्चा तेल जब गिरता है तो तेल कंपनियां पेट्रोल, डीजल सस्ता नहीं करती हैं. इस पर कंपनियों का तर्क ये होता है कि जब क्रूड पहले महंगा हुआ था, तब उन्होंने पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला था और खुद नुकसान झेला था. इसलिए जब क्रूड सस्ता होता है, तो कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतों को ऊंचा रखकर पहले अपने घाटे की भरपाई करती हैं.

अगर घाटे की भरपाई ठीक-ठाक हो गई तो ही कीमतें घटाने पर विचार किया जा सकता है. मगर, ऐसा होता नहीं है. यही वजह है कि अक्सर देखने में आता है कि क्रूड 4-5% गिरा है, लेकिन घरेलू बाजार में तेल के दाम वहीं के वहीं बने हुए हैं. क्योंकि कंपनियां कहती हैं कि पहले की भरपाई अभी बाकी है.

सवाल नंबर 2 – क्रूड महंगा तो पेट्रोल-डीजल स्थिर क्यों?

ये सवाल पहले सवाल से भी ज्यादा दिलचस्प है, वजह है इसके पीछे का लॉजिक. हम सभी जानते हैं कि पेट्रोल को साल 2010 में बाज़ार के हवाले कर दिया गया था यानी डीरेगुलेट किया गया था और डीज़ल को 2014 में. इसलिए जब सरकार से पेट्रोल डीजल की कीमतें घटाने के लिए कहा जाता है तो वो ये कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि ये तो तेल कंपनियों के हवाले है. तकनीकी रूप से देखा जाए तो उनका जवाब बिल्कुल दुरुस्त है.

लेकिन, तेल की कीमतों को तय करने में सरकार का कोई रोल ही नहीं, ये भी पूरी तरह से सही नहीं है. सरकार के पास एक ऐसा हथियार है जिससे वो तेल की कीमतों को कंट्रोल करती है, उसका नाम है एक्साइज़ ड्यूटी.

जब भी इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड की कीमतें उछलती हैं, सरकार तुरंत एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ा देती है, ताकि ज्यादा से ज्यादा राजस्व सरकार के ख़जाने में जाए, क्योंकि इससे उनका इंपोर्ट बिल घटता है. यानी जो फायदा जनता को मिलना चाहिए था, सरकार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर अपने पास रख लेती है.

कई मौकों पर घटी एक्साइज़ ड्यूटी

अगर क्रूड महंगा हुआ तो, ये स्थिति सरकार के लिए काफी दिलचस्प होती है. क्योंकि सरकार नहीं चाहती कि महंगे पेट्रोल-डीजल को लेकर उसे घेरा जाए. इसलिए हम देखते हैं कि चुनाव के दौरान अक्सर सरकार एक्साइज ड्यूटी में कटौतियों का ऐलान करती है. ऐसा सरकार ने कई बार किया है.

नवंबर 2021
3 नवंबर 2021 को केंद्र सरकार ने दिवाली से ठीक पहले पेट्रोल पर 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटाने का फैसला किया. जिससे पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत कम हो गईं. कई राज्यों ने VAT भी घटाया था

मई 2022
21 मई 2022 को बढ़ती महंगाई और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने फिर से एक्साइज ड्यूटी घटाई. पेट्रोल पर 8 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 6 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई. जिससे तेल की कीमतें 9.5 रुपये तक सस्ती हुईं

साल 2026
इसी साल मार्च में सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में करीब 10 रुपये प्रति लीटर की बड़ी कटौती की, जिससे पेट्रोल पर ड्यूटी घटकर करीब 3 रुपये प्रति लीटर रह गई और डीजल पर ये लगभग खत्म हो गई. लेकिन तेल मार्केटिंग कंपनियों ने इसका इस्तेमाल अपने घटते मार्जिन को पाटने के लिए किया, कंज्यूमर को उतनी राहत नहीं दी.

इसलिए ये इससे साफ पता चलता है कि सरकार चाहे तो टैक्स के जरिए दाम बदल सकती है, भले ही वो रोज-रोज कीमत तय करने के दायरे में नहीं है.

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