सरकार के इस नियम के बाद 2027 से महंगी हो जाएंगी कारें! जानिए क्या है फ्यूल इकोनॉमी पर नया रूल

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Planning to Buy a Car? Here's How the New Fuel Economy Rules Could Affect Prices

अगर आप नई कार खरीदने की सोच रहे हैं तो ये खबर आपके लिए है. सरकार ने एक नया ड्राफ्ट जारी किया है, जिसका असर सीधे आपकी जेब पर पड़ने वाला है. हालांकि अभी इसकी चर्चा सिर्फ ऑटो इंडस्ट्री और मंत्रालयों के गलियारों तक सीमित है. मगर, जब ये लागू हो जाएगा तो छोटी, किफायती कारें आने वाले सालों में महंगी हो सकती हैं, क्योंकि उन्हें भी अब भारी गाड़ियों जितनी सख्त फ्यूल एफिशिएंसी की शर्तों को पूरा करना होगा.

इसके अलावा, कंपनियां EV पर पहले से कहीं ज्यादा जोर देंगी, क्योंकि नए नियमों में इन्हें सीधा फायदा मिलेगा. जिसका असर आपको शोरूम में पेट्रोल गाड़ियों से ज्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मौजूदगी के रूप में दिखाई देगा. गाड़ी बनाने की तकनीक पर बढ़ने वाला खर्च भी कुछ हद तक ग्राहकों की जेब तक पहुंच सकता है.

अब ये नियम क्या है, जिसकी वजह ये सबकुछ होगा. भारत में पैसेंजर व्हीकल्स की फ्यूल एफिशिएंसी तय करने वाला नियम जिसे CAFE (Corporate Average Fuel Efficiency) कहा जाता है, अब तीसरे और सबसे बड़े बदलाव के दौर में पहुंच चुका है. बिजली मंत्रालय और ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) की तरफ से तैयार गया ये नया ड्राफ्ट, जिसे इंडस्ट्री में CAFE 2027 या CAFE-III कहा जा रहा है, 1 अप्रैल 2027 से लागू करने की तैयारी है.

CAFE नियम असल में हैं क्या

तो सबसे पहले समझते हैं कि CAFE 2027 या CAFE-III आखिर काम कैसे करता है, इसका कार कीमतों पर कैसे असर होता है.

CAFE नियमों का मकसद कारों की ईंधन दक्षता बढ़ाना, कार्बन उत्सर्जन घटाना और देश की तेल इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना है. CAFE किसी एक कार मॉडल पर नहीं, बल्कि किसी कंपनी की ओर से एक साल में बेची गई सभी कारों की औसत ईंधन खपत और CO2 उत्सर्जन पर लागू होता है. मतलब अगर कोई कंपनी भारी SUV भी बेचती है और छोटी हैचबैक भी, तो उसकी पूरी रेंज का औसत ही तय करता है कि वो नियम के दायरे में है या नहीं.

अगर किसी कंपनी का पूरा पोर्टफोलियो तय स्टैंडर्ड को पूरा करता है, तो उसे नियमों का पालन करने वाला माना जाएगा. जो लक्ष्य पूरे नहीं करते ऐसी कंपनियों को अतिरिक्त कदम उठाने होते हैं. ये नियम 2017 से चरणबद्ध तरीके से लागू है और समय के साथ सख्त हुई है. पहला चरण 2017-22, दूसरा 2022-23 से अभी तक लागू है, और अब तीसरा चरण अप्रैल, 2027 से शुरू होने वाला है और अगले 5 साल तक लागू रहेगा.

अब नए CAFE में क्या बदल जाएगा

अभी जो नियम हैं, उसके मुताबिक फ्लीट-औसत उत्सर्जन करीब 113 ग्राम CO2 प्रति किलोमीटर तक सीमित है. नए प्रस्ताव में सख्तियां बढ़ा दी गई हैं. 2027-2032 का टारगेट 91.7 g CO2/km और CAFE-IV मतलब 2032-2037 का टारगेट 70 g CO2/km कर दिया गया है. हालांकि सितंबर 2025 में जो पहला ड्राफ्ट आया था, उसके मुकाबले अप्रैल 2026 में बिजली मंत्रालय ने एक कम सख्त वर्जन पेश किया है, जिसमें सालाना कटौती की दर को थोड़ा आसान बनाया गया है ताकि ऑटो इंडस्ट्री को झटका कम लगे.

EV और हाइड्रोजन गाड़ियों को फायदा

नए नियमों में हर तरह की गाड़ी के लिए एक अलग “बोनस पॉइंट” तय किया गया है, इस सुपर क्रेडिट मल्टीप्लायर कहा गया है. इसमें सबसे ज्यादा फायदा प्योर इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन गाड़ियों को मिल रहा है, जबकि हाइब्रिड गाड़ियों को मिलने वाली छूट धीरे-धीरे कम की जा रही है.

  • हाइड्रोजन से चलने वाली गाड़ियों को फैक्टर 3 है. जिसे बढ़ाकर 5 गुना करने का प्रस्ताव है.
  • प्योर इलेक्ट्रिक गाड़ियों (BEV) के फैक्टर भी 3 से बढ़ाकर 4 गुना करने का प्रस्ताव है
  • प्लग-इन हाइब्रिड पर फायदा कम होगा, अभी फैक्टर 2.5 है जिसे CAFE-III में घटाकर 2 करेंगे. CAFE-IV में ये 1.5 रह जाएगा.
  • स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड गाड़ियों के लिए अभी फैक्टर 2 है, CAFE-III में घटकर 1.2 गुना और CAFE-IV में सिर्फ 1 गुना रह जाएगा.

आसान भाषा में समझें तो जो कंपनी जितनी ज्यादा EV बेचेगी, उसके लिए बाकी पेट्रोल-डीजल गाड़ियों पर सख्त लक्ष्य पूरा करना उतना आसान होगा.

क्रेडिट ट्रेडिंग का सिस्टम

अगर कोई कंपनी तय लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करती है, तो उसके पास अतिरिक्त “क्रेडिट” बच जाते हैं, जिन्हें वो दूसरी कंपनियों को बेच सकती है जो लक्ष्य से पीछे रह गई हैं. इसके अलावा पूलिंग की भी सुविधा दी गई है, तीन कंपनियों तक का ग्रुप मिलकर एक यूनिट की तरह अपने फ्लीट-औसत की कैलकुलेशन करवा सकता है. मतलब, जो कंपनी EV बनाने में पीछे है, वो किसी EV-बनाने वाली कंपनी के साथ साझेदारी करके पेनल्टी से बच सकती है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक क्रेडिट की कीमत खुद भी हर साल बढ़ती जाएगी, वित्त वर्ष 2028 में ये करीब 2,500 रुपये प्रति ग्राम CO2/किमी शॉर्टफॉल से शुरू होकर 2032 तक 4,500 रुपये तक पहुंच सकती है. ये कीमत हर साल 500 रुपये बढ़ेगी. जो क्रेडिट तय कंप्लायंस की तारीख के दौरान इस्तेमाल नहीं किए जाएंगे, वे अंतिम तारीख के खत्म होने के बाद अपने आप ही खत्म हो जाएंगे. यानी जो कंपनियां शुरू में ही कंप्लायंस में पिछड़ जाएंगी, उनके लिए आगे चलकर सुधार करना महंगा होता चला जाएगा.

नियम न मानने पर कितना बड़ा जुर्माना

अगर कोई ऑटो कंपनी तय फ्यूल इकोनॉमी के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाती है, तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है. हालांकि, ड्राफ्ट में ये अभी साफ नहीं किया गया है कि पेनल्टी की राशि कितनी होगी. सालाना 1,000 से कम गाड़ियां बेचने वाली ऑटो कंपनियों इन नियमों से फिलहाल बाहर रखा गया है.

क्या कारें महंगी हो सकती हैं?

अब सवाल ये कि इन नए मानकों का असर आम लोगों पर क्या होगा, क्या कार कीमतें बढ़ेंगी? देखिए इन मानकों को पूरा करने की जिम्मेदारी ऑटो कंपनियों की है. ऑटो कंपनियों को इंजन टेक्नोलॉजी में सुधार करना होगा, हल्के मैटेरियल का इस्तेमाल, बेहतर ट्रांसमिशन सिस्टम, हाइब्रिड तकनीक और दूसरे मॉडर्न फीचर्स गाड़ी में डालने होंगे, तो जाहिर है कंपनियों को मोटा निवेश करना होगा. जिससे गाड़ियों की प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ जाएगी.

अगर कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक ऊंची कीमतों के रूप में पहुंच सकता है. यानी कारें महंगी होंगी. हालांकि, सभी कारों की कीमतें एक जैसी नहीं बढ़ेंगी. जिन कंपनियों के पास पहले से आधुनिक तकनीक और फ्यूल एफिशिएंट मॉडल हैं. उन पर दबाव कम आएगा. बाकी तो कंपनी पर निर्भर करता है कि वो ग्राहकों पर कितना बोझ डालना चाहती है और खुद कितना बोझ उठाना चाहती है.

ड्राफ्ट नियम पर ऑटो इंडस्ट्री बंटी

सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) ने इस प्रस्ताव को संतुलित बताते हुए इसको सपोर्ट किया है. जबकि कुछ ऑटोमेकर्स ने छोटी पेट्रोल कारों के लिए अतिरिक्त राहत देने की मांग की है, जबकि कुछ कंपनियों ने इस कैटेगरी के लिए अलग नियम बनाए जाने का विरोध किया है.

ऊर्जा मंत्रालय ने इस ड्राफ्ट पर इंडस्ट्री और दूसरे स्टेकहोल्डर्स, आम जनता से सुझाव मंगाए हैं. अपने सुझाव saket-upsc@gov.in पर ईमेल कर सकते हैं. सुझाव भेजने की अंतिम तारीख 6 अगस्त 2026 तय की गई है.

यहां पढ़िए सरकार की ओर से जारी ड्राफ्ट –

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