Credit Card Limit: क्या ज्यादा सैलरी वालों को मिलती है ऊंची लिमिट? बैंक देखते हैं ये 5 चीजें

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Credit Card Limit: Does a Higher Salary Mean a Higher Credit Limit? Banks Check These 5 Factors

आज के समय में क्रेडिट कार्ड का चलन काफी बढ़ गया है. क्रेडिट कार्ड सिर्फ एक पेमेंट करने का ज़रिया नहीं है, बल्कि ये आपकी वित्तीय साख को भी दर्शाता है. किसी को पहला क्रेडिट कार्ड मिलते ही 30,000 रुपये की लिमिट मिलती है, तो किसी के कार्ड पर शुरुआत से ही 5 लाख रुपये या 10 लाख रुपये तक की लिमिट मिल जाती है.

फिर हम सोचते हैं कि ऐसा कैसे होता है, बैंक या कार्ड जारी करने वाली कंपनियां ये कैसे तय करती हैं कि किस ग्राहक को कितनी Credit Limit दी जाए? शायद ज्यादा सैलरी वालों को ज्यादा लिमिट मिलती होगी? शायद रिजर्व बैंक तय करता होगा कि किसे कितनी लिमिट दी जाए, लेकिन ऐसा नहीं है.

RBI ये तय नहीं करता है कि किसी व्यक्ति को क्रेडिट कार्ड पर कितनी लिमिट दी जाए, या फिर उसकी सैलरी ज्यादा है तो उसकी लिमिट ज्यादा होगी. ऐसा कोई नियम नहीं है कि हर ग्राहक के लिए एक तय अधिकतम सीमा हो. हर बैंक और कार्ड जारी करने वाली कंपनी अपने इंटरनल रिस्क असेसमेंट और ग्राहक की फाइनेंशियल प्रोफाइल के आधार पर लिमिट तय करती है.

यही वजह है कि एक ही बैंक का एक जैसा क्रेडिट कार्ड रखने वाले दो ग्राहकों की Credit Limit बिल्कुल अलग हो सकती है. अगर आप नया क्रेडिट कार्ड लेने की सोच रहे हैं या मौजूदा कार्ड की लिमिट बढ़वाना चाहते हैं, तो ये समझना बेहद जरूरी है कि बैंक किन बातों को सबसे ज्यादा तवज्जो देते हैं.

Credit Card Limit क्या होती है?

सरल शब्दों में समझें तो क्रेडिट कार्ड लिमिट वो अधिकतम रकम होती है, जिसे आप अपने क्रेडिट कार्ड से खर्च कर सकते हैं. मान लीजिए बैंक ने आपको क्रेडिट कार्ड पर 50 हजार रुपये की क्रेडिट लिमिट दी है. इसका मतलब ये नहीं कि बैंक ने आपको 50,000 रुपये दिए हैं. इसका मतलब केवल इतना है कि आप ज्यादा से ज्यादा 50,000 रुपये ही खर्च कर सकते हैं. बाद में बिल आने पर आपको ये राशि तय समय के भीतर चुकानी होती है. अगर आपने 50,000 रुपये की लिमिट में से सिर्फ 20,000 रुपये खर्च किए हैं तो 30,000 रुपये आपकी क्रेडिट लिमिट बची हुई है. मान लीजिए कि आपने वो 20,000 रुपये चुका दिए तो वापस से आपकी क्रेडिट लिमिट 50,000 रुपये हो जाएगी.

क्रेडिट कार्ड पर लिमिट को लेकर कोई मैक्सिमम सीमा नहीं है. ये कस्टमर की प्रोफाइल, रिस्क पर निर्भर करता है कि उसे कितनी क्रेडिट लिमिट दी जाएगी. ज्यादातर मामलों में शुरुआती क्रेडिट लिमिट कस्टमर की मंथली इनकम, उसकी क्रेडिट हिस्ट्री, और कुल वित्तीय जोखिम को देखते हुए तय की जाती है. कई मामलों में कस्टमर की मंथली इनकम से ज्यादा उसकी क्रेडिट लिमिट होती है. जैसे – किसी व्यक्ति की मंथली सैलरी 50,000 रुपये है तो उसको 2 लाख रुपये तक की लिमिट भी मिल सकती है.

बैंक कैसे तय करते हैं Credit Card Limit

ये बहुत बड़ी गलतफहमी है कि ज्यादा सैलरी वालों को बैंक फटाफट क्रेडिट कार्ड दे देते हैं या फिर ज्यादा क्रेडिट लिमिट दे देते हैं. जब भी कोई शख्स क्रेडिट कार्ड के लिए अप्लाई करता है तो बैंक उसको कई पैरामीटर पर परखते हैं, सिर्फ सैलरी पर नहीं.

बैंक ये समझने की कोशिश करते हैं कि ग्राहक भविष्य में उधार लिया गया पैसा समय पर लौटा पाएगा या नहीं. इसी को रिस्क असेसमेंट कहते हैं, बैंक अपना पैसा किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं देगा, जहां से उसके वापस आने की गुंजाइश कम हो. इसी आधार पर व्यक्ति की क्रेडिट लिमिट तय होती है. तो चलिए एक-एक करके समझते हैं कि वो पैरामीटर्स क्या हैं, जो क्रेडिट कार्ड की लिमिट तय करते हैं.

  1. मंथली इनकम (Monthly Income)

क्रेडिट कार्ड की लिमिट तय करने में सबसे पहला और सबसे जरूरी फैक्टर आपकी मंथली इनकम होती है. अगर आपकी रेगुलर इनकम ज्यादा है, तो बैंक ये मानते हैं कि आपके पास क्रेडिट कार्ड बिल चुकाने की क्षमता भी बेहतर होगी.

जैसे कि 40,000 रुपये मंथली सैलरी वाले व्यक्ति को मिलने वाली लिमिट और 2 लाख कमाने वाले व्यक्ति को मिलने वाली लिमिट एक जैसी हो, ऐसी संभावना कम होगी. मगर, इसका मतलब ये नहीं कि सिर्फ सैलरी ज्यादा होना ही काफी है, बैंक ये भी देखते हैं कि आपकी आय कितनी स्टेबल है और भविष्य में उसके बने रहने की संभावना कितनी है.

  1. पहले से कोई लोन या क्रेडिट कार्ड

बैंक क्रेडिट कार्ड देते समय देखता है कि कस्टमर पर पहले से कोई लोन तो नहीं चल रहा है, जैसे- होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन या फिर कोई क्रेडिट कार्ड पहले से है जिसका ड्यू पेमेंट है. ऐसे में अगर किसी व्यक्ति की सैलरी 2 लाख रुपये मंथली है, लेकिन उस पर ये तमाम तरह के लोन चल रहे हैं, तो जाहिर है बैंक इस बात को ध्यान में रखेगा और उसी हिसाब से व्यक्ति को क्रेडिट लिमिट देगा, सिर्फ इसलिए नहीं कि उसकी मंथली सैलरी 2 लाख रुपये है. क्योंकि उसके ऊपर चल रहे लोन की वजह से उसकी रीपेमेंट क्षमता वैसे ही कम है. ऐसा व्यक्ति बैंक के लिए जोखिम वाला हो सकता है.

अब व्यक्ति जिसकी सैलरी 40,000 रुपये है, लेकिन उसके ऊपर कोई लोन नहीं, दूसरा क्रेडिट कार्ड नहीं तो बैंक उसकी स्टेबल इनकम के आधार पर रिस्क असेसमेंट के बाद अच्छी क्रेडिट लिमिट ऑफर कर सकता है.

  1. रेगुलर इनकम है या नहीं

बैंकों के लिए ये बहुत बड़ा फैक्टर है. वो ये देखते हैं कि क्रेडिट कार्ड के लिए अप्लाई करने वाला व्यक्ति कहीं एक जगह टिककर काम करता है या नहीं. वो किस कंपनी में काम करता है, कोई प्रतिष्ठित कंपनी है या फिर कोई छोटी-मोटी कंपनी है. व्यक्ति लंबे समय से किसी एक ही कंपनी में काम कर रहा है या फिर बार-बार नौकरी बदलने का इतिहास है.
अगर वो बिज़नेस भी करता है तो रेगुलर इनकम है या नहीं. ये सारी बातें बैंक चेक करते हैं. फिर ये तय करते हैं कि क्रेडिट कार्ड देना है या नहीं, अगर देना है तो लिमिट कितनी होगी. यही वजह है कि कई बार एक बराबर सैलरी होने के बावजूद दो लोगों की Credit Limit अलग-अलग होती है.

  1. CIBIL Score और Credit History

CIBIL स्कोर सारे असेसमेंट का बाप है, जिसे क्रेडिट स्कोर कहते हैं. अगर किसी शख्स का क्रेडि स्कोर खराब है तो बैंक्स लोन या क्रेडिट कार्ड देने से बचते हैं. फाइनेंस की दुनिया में CIBIL स्कोर एक तरह का ‘कैरेक्टर सर्टिफिकेट’ होता है. जैसे समाज में किसी खराब कैरेक्टर के व्यक्ति के साथ बर्ताव होता है, वैसे ही खराब CIBIL स्कोर वाले के साथ वित्तीय संस्थान बर्ताव करते हैं. भारत में करीब करीब सभी बैंक्स CIBIL सहित दूसरे क्रेडिट ब्यूरो की रिपोर्ट देखते हैं.

यानी बैंक्स केवल ये नहीं देखते कि किसी व्यक्ति ने लोन लिया था या नहीं, उनकी नजर इस बात पर ज्यादा होती है कि उसने भुगतान किस तरह किया. अगर व्यक्ति ने कई सालों तक बिना किसी देरी के सभी क्रेडिट कार्ड्स के बिल चुकाए हैं, लोन की EMI समय पर दी है. तो बैंकों की नजर में उसकी इज्ज़त बढ़ जाती है. इसलिए ऐसे लोगों को समय-समय पर Automatic Credit Limit Enhancement का ऑफर भी मिलता रहता है.

इसके उलट अगर लोन की EMI लेट हुई है, Credit Card पेमेंट डिफॉल्ट हुआ है. लोन सेटलमेंट किया गया है, तो बैंक या तो कम लिमिट देंगे या एप्लीकेशन को ही रिजेक्ट कर देंगे. याद रखें, Credit Score केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि ये किसी की भी Financial Credibility की रिपोर्ट है.

  1. बैंकिंग रिलेशनशिप

कई लोग यह नहीं जानते कि जिस बैंक में आपका सैलरी अकाउंट या सेविंग्स अकाउंट है, वहां से क्रेडिट कार्ड अप्रूवल मिलने की संभावना और बेहतर लिमिट मिलने के अवसर भी बढ़ सकते हैं. अगर बैंक कई सालों से आपके खाते में रेगुलेर सैलरी, सेविंग्स और ट्रांजैक्शंस देख रहा है. तो उसे आपकी वित्तीय स्थिति का बेहतर अंदाजा होता है. इसी वजह से कई बैंक अपने पुराने ग्राहकों को प्री-अप्रूव्ड क्रेडिट कार्ड्स और ज्यादा क्रेडिट लिमिट ऑफर करते हैं.

इसलिए अगर बार जब आप क्रेडिट कार्ड के लिए अप्लाई करने की सोचें तो ये पांचों फैक्टर्स को ध्यान में रखें. इसमें भी सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम यही है कि आप अपना क्रेडिट स्कोर चेक करें. एक बार जब आपकी फाइनेंशियल प्रोफाइल मजबूत हो जाती है, तो लिमिट बढ़ाना या क्रेडिट कार्ड मिलना कोई मुश्किल काम नहीं रह जाता.

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