Oil Prices Rise : मिडिल ईस्ट तनाव बढ़ने से कच्चे तेल में उबाल, ब्रेंट $97 के पार; सप्लाई संकट की आशंका बढ़ी

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Oil Prices Rise as Middle East Conflict Escalates, Brent Tops $97

मिडिल ईस्ट में तनाव की आग जैसे-जैसे बढ़ रही है, कच्चे तेल की कीमतों में उबाल भी वैसे-वैसे बढ़ता जा रहा है. ईरान ने अमेरिका को धमकी दी है कि अगर उसके ठिकानों पर फिर से कोई कार्रवाई की गई, तो वो इसका तगड़ा जवाब देगा. ऐसे में मार्केट को लग रहा है कि दोनों देशों के बीच अब ये जंग जल्द खत्म नहीं होगी. जिसका असर कच्चे तेल की सप्लाई पर पड़ेगा.

यही वजह है कि ब्रेंट क्रूड का भाव अब 97 डॉलर के पार चला गया है. इसने 8 सितंबर, 2026 को 97.37 डॉलर प्रति बैरल का ऊंचा स्तर छुआ है. जबकि WTI क्रूड 1.26% की तेजी के साथ 92.72 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया.

इससे पहले सोमवार को ब्रेंट क्रूड 24 जुलाई के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था. बाजार में लगातार बढ़ता तनाव अब कच्चे तेल की कीमतों में एक अतिरिक्त ‘रिस्क प्रीमियम’ जोड़ रहा है. यानी निवेशक इस आशंका के चलते ज्यादा कीमत देने को तैयार हैं कि अगर संघर्ष और बढ़ा तो तेल की सप्लाई में रुकावनटें आ सकता है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चिंता बढ़ी

मौजूदा संकट में सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है. ये दुनिया के सबसे अहम तेल शिपिंग रूट्स में से एक है और गल्फ ऑफ पर्शियन से होने वाली बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आवाजाही इसी रास्ते से होती है. अगर इस इलाके में सैन्य तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो ग्लोबल मार्केट में तेल की उपलब्धता को लेकर बड़ी चिंता पैदा हो सकती है. यही वजह है कि निवेशक अभी से सप्लाई रिस्क को कीमतों में शामिल कर रहे हैं.

ईरान ने सोमवार को चेतावनी दी कि खाड़ी क्षेत्र में मौजूद एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसमें अमेरिकी तेल और गैस के हित भी शामिल हैं, निशाने पर हो सकते हैं. ये बयान ऐसे समय आया है जब पिछले वीकेंड अमेरिका और ईरान के बीच जवाबी सैन्य कार्रवाई देखने को मिली.

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, शनिवार को अमेरिकी सेनाओं ने ईरान के तीन तेल टैंकरों पर हमला किया, जिनमें से एक टैंकर खर्ग द्वीप के पास था. खर्ग द्वीप ईरान का सबसे बड़ा ऑयल एक्सपोर्ट हब माना जाता है. ये हमला ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की ओर से क्षेत्र में तैनात अमेरिकी युद्धपोतों पर किए गए हमलों के जवाब में हुआ था. इसने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है, जिससे बाजार में सप्लाई चेन बाधित होने की आशंकाएं तेज हो गई हैं.

सबसे बड़ी समस्या ये है कि फिलहाल किसी तत्काल कूटनीतिक समाधान के संकेत नहीं दिख रहे हैं. ऐसे में बाजार इस संभावना को तेजी से कीमतों में शामिल कर रहा है कि दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी लंबा चल सकता है.

क्या कहते हैं एनालिस्ट

ANZ का नज़रिया

ANZ के एनालिस्ट डैनियल हायनस के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में हालिया तनाव ने लंबे गतिरोध की संभावना बढ़ा दी है. अमेरिका और ईरान के बीच सीमित लेकिन लगातार सैन्य कार्रवाई की स्थिति बनी रह सकती है और इस वजह से 2026 के बाकी हिस्से में पर्शियन गल्फ से तेल सप्लाई पर असर पड़ सकता है. डैनियल का अनुमान है कि ऑयल सप्लाई का पूरी तरह से पहले के स्तर पर लौटना 2027 की पहली तिमाही के अंत या दूसरी तिमाही की शुरुआत तक ही संभव हो सकता है.

गोल्डमैन सैक्स का नज़रिया

मौजूदा हालातों को देखते हुए गोल्डमैन सैक्स ने भी अपने कच्चे तेल को लेकर अपने अनुमानों में बदलाव किया है. गोल्डमैन सैक्स ने दिसंबर 2026 के लिए ब्रेंट और WTI के अनुमान में 5 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी की है. अब अनुमान है कि दिसंबर 2026 में ब्रेंट क्रूड करीब 85 डॉलर और WTI करीब 80 डॉलर प्रति बैरल रह सकता है. वहीं 2027 के लिए बैंक ने ब्रेंट क्रूड का अनुमान 80 डॉलर और WTI का अनुमान 75 डॉलर प्रति बैरल रखा है.

अनुमानों में ये बदलाव क्यों किया गया? इस पर गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि मिडिल ईस्ट में जहाजों की आवाजाही को लेकर रुकावटें 2027 तक जारी रह सकती हैं. यानी गोल्डमैन सैक्स ये मानकर चल रहा है कि मौजूदा संकट सिर्फ कुछ दिनों या हफ्तों की समस्या नहीं है.

मारेक्स का नज़रिया

फाइनेंशियल सर्विसेज प्लेटफॉर्म Marex के एनालिस्ट एड मीर का मानना है कि जब तक युद्ध जारी रहता है, तब तक तेल की कीमतें ऊंचे स्तरों पर ही बनी रह सकती हैं. Marex के मुताबिक, संघर्ष को खत्म करने से जुड़े कई अहम मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं. इसलिए अगर सैन्य तनाव जल्दी कम नहीं होता है तो साल के अंत तक कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है.

आगे क्या होगा?

अब ऑयल मार्केट की नजरें तीन चीजों पर रहेंगी. पहला तो ये कि बाजार ये देखेगा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव अभी और कितने हफ्ते या महीने खिंचता है. लंबा खिंचा तो मुश्किलें बढ़ेंगी. साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाली शिपमेंट्स के लिए कितना जोखिम है या ये आवाजाही कितनी सामान्य रहती है. आखिर में- हालांकि ऐसी उम्मीद करना जल्दबाजी है, मगर फिर भी, बाजार ये देखना चाहेगा कि क्या दोनों देशों के बीच कोई डिप्लोमैटिक बातचीत शुरू होती है. अगर ऐसा कोई भी संकेत मिलता है तो वहीं से हम कीमतों में नरमी देख सकते हैं.

  • अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव कितना बढ़ता है
  • स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से ऑयल शिपमेंट्स कितनी सामान्य रहती हैं
  • क्या दोनों के बीच कोई डिप्लोमैटिक बातचीत शुरू होती है

अगर तनाव सीमित रहता है और तेल सप्लाई सामान्य बनी रहती है तो मौजूदा रिस्क प्रीमियम धीरे-धीरे कम हो सकता है, लेकिन अगर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर या फिर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही पर कोई असर पड़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है.

तेल की बढ़ती कीमतों का असर सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि काफी व्यापक होता है. कच्चे तेल की लागत बढ़ने से ट्रांसपोर्टेशन, मैन्युफैक्चरिंग और इंपोर्ट पर निर्भर इकोनॉमी में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है. भारत जैसे देश, जो अपनी तेल जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर इंपोर्ट पर निर्भर हैं, उनके लिए ये पूरी तस्वीर काफी मायने रखती है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी सीधे तौर पर घरेलू ईंधन कीमतों और चालू खाते के घाटे पर असर डालती है.

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