अमेरिका में नौकरी कर रहे भारतीय IT प्रोफेशनल्स के लिए ट्रंप सरकार हर बार कुछ ऐसा ऐलान करती है, जिससे उनकी नींद उड़ जाए. ट्रंप सरकार की ओर से एक नया प्रस्ताव पेश किया गया है, जो अगर लागू हो गया तो, जिस भी प्रोफेशन की अमेरिका में नौकरी गई और तुरंत दूसरी नौकरी नहीं मिली, तो उसे अपना बोरिया बिस्तर बांधकर वापस देश लौटना पड़ेगा. क्योंकि जो प्रस्ताव दिया गया है, उसके मुताबिक अमेरिका का होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट, यानी DHS H-1B वीजा पर नौकरी तलाशने के लिए मिलने वाली 60 दिन की ग्रेस पीरियड सुविधा को खत्म करने की तैयारी में है. इसके लिए DHS ने एक प्रस्ताव पेश किया है.
मामला क्या है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मौजूदा व्यवस्था क्या है. 2017 से H-1B और कुछ दूसरे टेम्पररी वर्क वीजा होल्डर्स के लिए एक ग्रेस पीरियड की व्यवस्था है. इसके तहत अगर किसी कर्मचारी की नौकरी चली जाती है, उसकी छंटनी हो जाए या कंपनी ही बंद हो जाए. तो वो आम तौर पर 60 दिन तक या अपने I-94 की वैलिडिटी खत्म होने तक, जो भी पहले हो, अमेरिका में रह सकता है.
इस दौरान वो नया स्पॉन्सर ढूंढ सकता है, वीज़ा स्टेटस बदल सकता है, या फिर अपना सामान समेटकर वापस लौट सकता है. अब ट्रंप प्रशासन इसी 60 दिन की मोहलत को खत्म करना चाहता है. अगर ये प्रस्ताव कानून बन गया, तो नौकरी जाते ही व्यक्ति का वीज़ा स्टेटस उसी दिन खत्म माना जाएगा. मतलब, आज नौकरी गई, तो कल सामान बांधकर एयरपोर्ट का रास्ता पकड़ना पड़ सकता है.
मतलब ये सिर्फ एक सरकारी नोटिफिकेशन नहीं है, यह लाखों भारतीय परिवारों की ज़िंदगी से जुड़ा मसला है. वो परिवार जिन्होंने अमेरिका में घर खरीदे हैं, बच्चों का स्कूल में एडमिशन कराया है, और जिनकी पूरी ज़िंदगी एक वीज़ा स्टैंप पर टिकी है. इसलिए प्रस्ताव लागू हुआ तो इसका असर सिर्फ अमेरिका में काम कर रहे किसी एक कर्मचारी पर नहीं, बल्कि उसके एम्पलॉयर, परिवार और पूरी रीलोकेशन प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है.
भारतीय IT प्रोफेशनल्स पर बड़ी मार
भारतीय IT प्रोफेनल्स के लिए ये नया नियम इसलिए भी काफी अहम है क्योंकि अमेरिका में H-1B वर्कफोर्स में भारतीयों की बड़ी हिस्सेदारी है. TCS, इंफोसिस, HCLTech और LTIMindtree जैसी भारतीय IT कंपनियां अमेरिका में बड़ी संख्या में H-1B प्रोफेशनल्स को स्पॉन्सर करती हैं. इसके अलावा Deloitte, PwC और EY जैसी कंसल्टिंग कंपनियां भी विदेशी स्किल्ड वर्कर्स पर निर्भर हैं. इन कंपनियों के हज़ारों इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट और प्रोजेक्ट मैनेजर अमेरिका में क्लाइंट प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं.
आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बना देते हैं. USCIS के मुताबिक, 30 सितंबर 2025 को खत्म हुए वित्त वर्ष में मंजूर की गई 1,14,806 नई H-1B याचिकाओं में से आधे से ज़्यादा, यानी 50.3%, भारत में जन्मे प्रोफेशनल्स को मिलीं. वीज़ा रीन्युअल के मोर्चे पर भी तस्वीर यही है. कुल 2,91,542 मंजूर की गई याचिकाओं में से 77.6% भारतीय प्रोफेनल्स के नाम रहे. यानी सीधे शब्दों में कहें तो, अमेरिका में काम कर रहे हर पांच में से करीब चार H-1B होल्डर भारतीय हैं. ज़ाहिर है, कोई भी नियम बदले, उसकी सबसे बड़ी मार भारतीय प्रोफेनल्स पर ही आनी है.
ज़रा सोचिए अगर, अमेरिका में मंदी का दौर है, टेक कंपनियां छंटनी कर रही हैं. ऐसे माहौल में अगर ग्रेस पीरियड ही खत्म हो जाए, तो एक भारतीय इंजीनियर के लिए लेऑफ का मतलब होगा, नौकरी के साथ-साथ घर, स्कूल, दोस्त और सालों की मेहनत से बनाई गई ज़िंदगी, सब कुछ एक झटके में छूट जाना.
HR टीमों के लिए भी ये किसी सिरदर्द से कम नहीं होगा. इमिग्रेशन वकीलों का कहना है कि इससे कंपनियों के पास लेऑफ मैनेज करने और ऑफबोर्डिंग प्रक्रिया पूरी करने का समय बेहद कम रह जाएगा. मतलब, फैसला जल्दी में लेना पड़ेगा, गलतियों की गुंजाइश और बढ़ जाएगी.
हालांकि ये सिर्फ अभी प्रस्ताव है. कानून नहीं बना है. जो व्हाइट हाउस की समीक्षा प्रक्रिया से गुज़र चुका है, लेकिन इसे अभी फेडरल रजिस्टर में औपचारिक रूप से प्रकाशित नहीं किया गया है. इसके बाद दो महीने की पब्लिक कमेंट लिए जाएंगे. यानी कानून बनने में अभी वक्त लगेगा. तबतक 60 दिन का नियम लागू रहेगा.
सिर्फ H-1B नहीं, और भी कई वीज़ा दायरे में
ये बदलाव सिर्फ H-1B तक सीमित नहीं है. इसका असर E-1 और E-2 (ट्रेडर वीज़ा), L-1 (इंटरनेशनल कंपनियों के मैनेजरों के लिए), O-1 (असाधारण प्रतिभा वालों के लिए), TN वीज़ा, साथ ही सिंगापुर और चिली के H-1B1 और ऑस्ट्रेलिया के E-3 वीज़ा धारकों पर भी पड़ेगा. यानी सिर्फ भारतीय इंजीनियर ही नहीं, दुनियाभर के स्किल्ड प्रोफेशनल्स की चिंता बढ़ गई है.
