PMFME Scheme: अगर आप भी कोई छोटा-मोटा फूड प्रोसेसिंग बिजनेस शुरू करके अपने पैसों पर खड़ा होना चाहते हैं, या फिर अपने पहले से चल रहे बिजनेस को बड़े स्केल पर लेकर जाना चाहते हैं और अपना एक ब्रांड बनाना चाहते हैं. मगर, पैसों की किल्लत आपके सपनों को पूरा करने में सबसे बड़ी रुकावट बन रही है, तो समझ लीजिए कि आपकी इस मुश्किल का हल हो गया है.
दरअसल, भारत में हजारों छोटे कारोबारी आटा, मसाले, अचार, पापड़, नमकीन, मिठाई, तेल, फल-सब्जियों से बने उत्पाद और दूसरे खाद्य उत्पाद तैयार करते हैं. इनमें से बड़ी संख्या ऐसे कारोबारों की है जो छोटे स्तर पर घर, दुकान या छोटी यूनिट से चलते हैं. कई बार कारोबार में अनुभव और ग्राहक तो होते हैं, लेकिन मशीनरी खरीदने, पैकेजिंग सुधारने, लाइसेंस लेने, ब्रांड बनाने और कारोबार बढ़ाने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं होती.
ऐसे ही छोटे फूड बिजनेसेस को मजबूत और औपचारिक बनाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फॉर्मलाइजेशन ऑफ माइक्रो फूड प्रोसेसिंग एंटरप्राइजेज यानी PMFME Scheme शुरू की है, ये योजना खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (Ministry of Food Processing Industries- MoFPI) के जरिए लागू की जाती है और इसमें छोटे फूड प्रोसेसिंग कारोबारों को वित्तीय मदद के साथ-साथ ट्रेनिंग, तकनीकी सहायता, ब्रांडिंग और मार्केटिंग जैसी सुविधाएं भी दी जाती हैं.
क्या है PMFME स्कीम?
PMFME का मुख्य उद्देश्य देश के माइक्रो फूड प्रोसेसिंग एंटरप्राइजेज को फॉर्मलाइज और अपग्रेड करना है. यानी जो छोटे कारोबारी पहले अनौपचारिक तरीके से काम कर रहे हैं, उन्हें बेहतर मशीनरी, पैकेजिंग, फूड सेफ्टी, अकाउंटिंग, रजिस्ट्रेशन और मार्केटिंग जैसी सुविधाओं के जरिए व्यवस्थित बिजनेस में बदलने में मदद करना.
इस योजना का उद्देश्य सिर्फ पैसों के जरिए मदद करना नहीं है, सरकार का फोकस छोटे फूड बिजनेस को इस तरह मजबूत करने पर है कि वे अपने उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ा सकें, उत्पादन बढ़ा सकें, बेहतर पैकेजिंग कर सकें और स्थानीय बाजार से आगे बढ़कर देश और दुनिया के दूसरे बाजारों तक पहुंच बना सकें.
कितनी मिल सकती है मदद?
इस स्कीम के तहत 35% तक की क्रेडिट लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी दी जाती है. यानी किसी माइक्रो फूड प्रोसिसिंग यूनिट के लिए उसकी प्रोजेक्ट लागत का 35% तक कैपिटल सब्सिडी मिल सकती है. जिसकी अधिकतम सीमा 10 लाख रुपये तक है. इसका मतलब ये नहीं है कि सरकार आपके खाते में सीधे 10 लाख रुपये डाल देती है. ये क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी है मतलब कि इसमें बैंक लोन शामिल होता है. स्कीम में अप्लाई करने वाले को भी अपनी तरफ से कुल लागत का कम से कम 10% योगदान देना होता है, बाकी रकम बैंक लोन के जरिए मिलती है.
जैसे मान लीजिए, अगर किसी प्रोजेक्ट की लागत 20 लाख रुपये है, तो उसका 35% यानी 7 लाख रुपये तक सब्सिडी मिल सकती है. लेकिन वास्तव में सब्सिडी कितनी होगी, ये उस एलिजिबल प्रोजेक्ट की लागत, बैंक लोन और योजना की शर्तों के आधार पर तय होगा.
एक और जरूरी बात ये है कि एलिजिबल प्रोजेक्ट की लागत में मुख्य रूप से प्लांट और मशीनरी और टेक्निकल सिविल वर्क शामिल हो सकता है, जबकि जमीन की कीमत, किराया या लीज पर लिए गए वर्क शेड जैसी लागतें लागत में शामिल नहीं होती हैं, साथ ही टेक्निकल सिविल वर्क पर भी एक सीमा लगी होती है.
किसके लिए है ये स्कीम?
PMFME का फायदा केवल किसी एक तरह के कारोबारी तक सीमित नहीं है. योजना के तहत इंडिविजुअल आंत्रप्रेन्योर के अलावा कई तरह के समूहों को भी सहायता दी जाती है.
इसमें इंडिविजुअल/प्रॉपराइटरशिप फर्म, पार्टनरशिप फर्म, FPOs, SHGs, को-ऑपरेटिव, NGOs और प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां जैसी कैटेगरी शामिल हैं. ये लाभ तभी मिल सकता है, जब वो योजना की पात्रता शर्तों को पूरा करते हैं. अगर कोई व्यक्ति यानी इंडिविजुअल एप्लीकेंट है, तो उसकी उम्र 18 साल होनी चाहिए. इसमें कोई एजुकेशनल क्वालिफिकेशन की शर्त नहीं है. एक परिवार से एक व्यक्ति को ही वित्तीय मदद मिल सकती है.
पुराने कारोबार को भी मिल सकती है मदद
इस स्कीम का एक बड़ा मकसद ये भी है कि पहले से चल रहे फूड प्रोसेसिंग बिजनेस को अपग्रेड करना है. मान लीजिए कोई व्यक्ति लंबे समय से अचार या मसाले बना रहा है, लेकिन उसका उत्पादन हाथ से होता है और पैकेजिंग भी छोटे स्तर की है. ऐसे कारोबारी को योजना के तहत मशीनरी, प्रोसेसिंग कैपिसिटी, पैकेजिंग को बेहतर बनाने के लिए बैंक से वित्तीय मदद मिल सकती है. योजना का फायदा उठाने वाले लोगों को आंत्रप्रेन्योरशिप, बुककीपिंग, मार्केटिंग, रजिस्ट्रेशन, FSSAI स्टैंडर्ड, साफ-सफाई और प्रोडक्ट स्पेसिफिक प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में ट्रेनिंग भी दी जाती है.
एक जिले से एक प्रोडक्ट!
PMFME को समझने के लिए ODOP यानी One District One Product को समझना बेहद जरूरी है. सरकार ने अलग-अलग जिलों के उन फूड प्रोडक्ट्स पर फोकस किया है जिनमें स्थानीय स्तर पर कच्चा माल, प्रोडक्शन, और बाज़ार की संभावनाएं हैं. इसका मकसद एक ही क्षेत्र के उत्पादों को स्केल का फायदा देना है. जैसे कच्चे माल की खरीद, कॉमन इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग में.
PMFME पोर्टल के मुताबिक ODOP के तहत 35 राज्यों/UTs के 713 जिलों के लिए 137 यूनीक प्रोडक्ट्स को मंजूरी दी गई है. इसका फायदा ये है कि किसी जिले में अगर किसी खास फूड प्रोडक्ट का मजबूत बेस है, तो वहां के छोटे कारोबारियों को उसी ईको-सिस्टम के आसपास डेवलप करने की कोशिश की जाती है.
आवेदन कैसे करना है?
आप इस स्कीम के लिए ऑनलाइन अप्लाई कर सकते हैं. इसके लिए MoFPI के PMFME पोर्टल पर पर जाना होता है. जो कि ये है – pmfme.mofpi.gov.in
आधिकारिक पोर्टल पर फिलहाल एप्लीकेंट रजिस्ट्रेशन, एप्लीकेंट लॉग-इन और एप्लीकेशन ट्रैकिंग की सुविधा उपलब्ध है. पोर्टल पर आवेदन की संख्या, बैंक लोन सैंक्शन और लोन डिस्बर्समेंट का स्टेटस भी देख सकते हैं.
सबसे पहले पोर्टल पर आपको पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होगा. इसके बाद अपने बिजनेस, फूड प्रोडक्ट, प्रस्तावित निवेश, मशीनरी और बैंक लोन से जुड़ी जानकारी भरनी होती है. साथ में DPR यानी डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट और जरूरी दस्तावेज अपलोड करने होते हैं.
आम तौर पर आधार, PAN, बैंक अकाउंट/पासबुक, बिजनेस या यूनिट से जुड़े दस्तावेज, FSSAI लाइसेंस/रजिस्ट्रेशन जहां लागू हो, जमीन/स्थान के दस्तावेज और मशीनरी के कोटेशंस जैसे कागजात की जरूरत पड़ सकती है. डॉक्यूमेंट्स की लिस्ट प्रोजेक्ट और राज्यों के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है.
आवेदन जमा होने के बाद प्रक्रिया आम तौर पर डिस्ट्रिक्ट रिसोर्स पर्सन (DRP) के पास जाती है, फिर डिस्ट्रिक्ट लेवल कमेटी (DLC) उसे बैंक के पास आगे बढ़ाती है. DRP आवेदन और DPR की जांच में मदद करता है, DLC प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की सिफारिश करती है और इसके बाद बैंक लोन एप्लीकेशन का असेसमेंट करता है.
सबकुछ सही रहा तो लोन मिल जाता है. लेकिन अप्रूवल के लिए कोई फिक्स्ड दिन तय नहीं है, हो सकता है 30 दिन लगे या 3 महीने में भी लग सकते हैं. समय आवेदन की जांच, दस्तावेज, DPR, DLC और बैंक के असेसमेंट पर निर्भर करता है. लोन का स्टेटस आप पोर्टल पर चेक कर सकते हैं.

