अमेरिका में 10 साल की बॉन्ड यील्ड सोमवार को 5% के ऊपर निकल गई. अक्टूबर 2023 के बाद पहली बार है जब बॉन्ड यील्ड ने इस ऊंचाई को पार किया है. आज मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को भी बॉन्ड यील्ड 5% के ऊपर ही है और इसने इंट्राडे में 5.027% का स्तर छुआ है.
बॉन्ड यील्ड का इस रफ्तार से बढ़ना अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होता है. इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि अगर बॉन्ड यील्ड बढ़ती है तो इसका क्या असर होता है, शेयर बाज़ार पर, सरकार पर, आम लोगों पर और कंपनियों पर?
बॉन्ड यील्ड होती क्या है?
बॉन्ड यील्ड का असर समझने से पहले ये समझें कि आखिर बॉन्ड यील्ड होती क्या है. जब सरकारों को किसी नए प्रोजेक्ट के लिए, किसी योजना के लिए या फिर कर्जों को चुकाने के लिए पैसों की जरूरत होती है तो बॉन्ड जारी करती है, जो एक सर्टिफिकेट होता है. मान लीजिए कि सरकार को 100 रुपये चाहिए, इस पर वो 10 साल तक 4% सालाना के हिसाब से ब्याज देगी, जिसे कि कूपन रेट कहते हैं, और 10 साल बाद जमा किया गया मूलधन 100 रुपये वापस कर देगी. ये सारी बातें उस बॉन्ड वाले सर्टिफिकेट पर लिखी होती हैं.
अगर कोई निवेशक सरकार को 100 रुपये देकर ये बॉन्ड खरीद लेता है तो उसे हर साल 4% की दर से 4 रुपये मिलेंगे. यानी 10 साल में उसे कुल 40 रुपये ब्याज के तौर पर मिलेंगे. अंत में उसे अपना 100 रुपये का मूलधन भी वापस मिल जाएगा.
याद रहे कि बॉन्ड की प्राइस और बॉन्ड यील्ड उल्टी दिशा में चलते हैं. यानी जब बॉन्ड की कीमतें गिरती हैं, तो बॉन्ड यील्ड बढ़ती है. एक उदाहरण से समझिए – मान लीजिए राहुल के पास 100 रुपये का बॉन्ड है जिस पर उसे 4% सालाना ब्याज मिलता है.
सीन नंबर 1-
एक दूसरा व्यक्ति रोहित है, जो बॉन्ड्स खरीदना चाहता है. उसके पास दो विकल्प हैं-
पहला- वो राहुल से ही बॉन्ड खरीद ले, जिस पर 4% सालाना ब्याज मिल रहा है
दूसरा – मार्केट से नया सरकारी बॉन्ड खरीद ले, जिस पर 5% ब्याज मिल रहा है
जाहिर है, वो दूसरा वाला विकल्प चुनेगा क्योंकि उस पर ज्यादा ब्याज मिल रहा है. ऐसे ही बॉन्ड यील्ड ऊपर जाती हैं.
सीन नंबर 2 –
राहुल को पैसों की सख्त जरूरत पड़ गई, वो अब अपना बॉन्ड बेचना चाहता है. वो रोहित के पास जाता है और कहता कि वो 100 रुपये वाला बॉन्ड खरीद ले. लेकिन रोहित कहता है कि “भाई, तुम्हारे बॉन्ड से मुझे सिर्फ 4 मिलेंगे, लेकिन नए बॉन्ड से मुझे 6 रुपये मिल रहे हैं. मैं तुम्हें 100 रुपये तो नहीं दूंगा, 90 रुपये चाहिए तो डील हो सकती है
राहुल इस डील के लिए हां बोल देता है. अब जरा कैलकुलेशन देखिए –
राहुल का 100 रुपये वाला बॉन्ड अब भी हर साल 4 रुपये ही ब्याज देगा, मगर चूंकि रोहित ने इसे 90 रुपये पर लिया है, तो नई यील्ड होगी
₹4 ÷ ₹90 = 4.44%
मतलब ये कि पहले 100 रुपये पर 4 रुपये ब्याज मिल रहा था, अब बॉन्ड की प्राइस गिरकर 90 रुपये हो गई तो बॉन्ड यील्ड बढ़कर 4.44% हो गई. यानी बॉन्ड की प्राइस गिर गई तो यील्ड बढ़ गई.
बॉन्ड यील्ड बढ़ने का असर
अब समझते हैं कि बॉन्ड यील्ड के बढ़ने का अलग-अलग लोगों, संस्थाओं पर क्या असर होता है. अमेरिका की 10-साल की बॉन्ड यील्ड को दुनिया के लिए इंटरेस्ट रेट का बेंचमार्क मानकर चलिए. क्योंकि जब ये ऊपर-नीचे होता है तो इसका असर सरकार, कंपनियों, बैंक, घर खरीदने वाले लोगों और शेयर बाजार तक जाता है.
अमेरिका सरकार पर असर
अमेरिकी सरकार पर पहले से ही 40 ट्रिलियन से ज्यादा का कर्ज है, जबकि 10 साल पहले तक ये 19.4 ट्रिलियन डॉलर हुआ करता था. सरकार को इस भारी भरकम कर्ज का ब्याज भी चुकाना होता है. अगर ब्याज दरें बढ़ेंगी तो ब्याज भी ज्यादा देना होगा. अब जब ट्रेजरी यील्ड बढ़ती है, तो सरकार के लिए नया कर्ज लेना महंगा हो जाता है. जिसके लिए ट्रेजरी यील्ड को कंट्रोल करना जरूरी होता है. पिछले दिनों हमने देखा कि अमेरिका ने इसीलिए लंबी अवधि के 6 बिलियन डॉलर के बॉन्ड्स का बायबैक करने का ऐलान किया. जिससे बॉन्ड यील्ड थोड़ी नीचे आईं.
अमेरिका की सरकार जो बॉन्ड्स जारी करती है, वो एक तय अवधि के लिए होते हैं, 2 साल, 5 साल, 10 साल, 20 साल और 30 साल. जब ये अवधि पूरी हो जाती है तो उसे पैसे वापस भी लौटाने होते हैं. लेकिन कई बार सरकार के पास इतना पैसा नहीं होता कि वो इन बॉन्ड्स का मूलधन लौटा सके. इसलिए वो नए बॉन्ड्स जारी करके पैसे जुटाती है और पुराने बॉन्ड्स का निपटारा करती है. इसे ‘रोलओवर’ कहते हैं.
इसलिए ट्रेजरी यील्ड जितनी ज्यादा होगी, नए कर्ज और पुराने कर्ज के रोलओवर की लागत उतनी ही बढ़ सकती है. जनवरी 2022 में अमेरिकी सरकार अपने कुल कर्ज पर औसतन सिर्फ 1.42% ब्याज दे रही थी, लेकिन जुलाई 2026 आते-आते ये औसत ब्याज दर बढ़कर 3.44% हो गई, यानी करीब ढाई गुना. अब असली समस्या यह है कि जब ब्याज चुकाने में ही ज्यादा पैसा जाने लगता है, तो सरकार के पास बाकी जरूरी कामों के लिए पैसा ही नहीं बचता, जिसका असर अर्थव्यवस्था पर आता है. इसलिए सरकार हमेशा चाहती है कि बॉन्ड यील्ड कम रहे.
कॉरपोरेट्स पर क्या असर?
बॉन्ड यील्ड बढ़ने का असर कंपनियों की कर्ज लेने की लागत (borrowing cost) पर भी पड़ता है. मान लीजिए किसी कंपनी को नया प्लांट लगाने या पुराने कर्ज का रोलओवर करने के लिए पैसा चाहिए. अगर US की 10-साल की ट्रेजरी यील्ड 5% है, तो निवेशक या बैंक्स कंपनी से इससे ज्यादा रिटर्न मांगेंगे, क्योंकि कंपनी में सरकार के मुकाबले ज्यादा रिस्क होता है. ऐसे में कंपनी को कर्ज 7% या 8% पर मिलेगा. इससे कंपनी का ब्याज खर्च बढ़ेगा, जिसका असर कंपनी के मुनाफे पर दिखाई देगा. मुनाफा गिरेगा तो कंपनी विस्तार योजनाओं को टालेगी, नई हायरिंग रुक जाएगी, छंटनियां भी हो सकती हैं और निवेश के फैसले भी टाल सकती है.
शेयर बाजार पर क्या असर?
बॉन्ड यील्ड बढ़ने का सीधा असर शेयर बाजार पर भी पड़ता है. मान लीजिए अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से शेयर बाजार के किसी निवेशक को 5% का रिटर्न मिल रहा है, जो कि एक बहुत सुरक्षित निवेश है, तो वो शेयर बाजार में पैसा लगाने से पहले सोचेगा कि क्या उसे वहां से इससे ज्यादा रिटर्न मिलेगा या नहीं. अगर उसे 10-12% या इससे ज्यादा का रिटर्न मिलने की उम्मीद होगी, तो वो शेयर बाजार में रिस्क लेगा, नहीं तो अपना पैसा बाजार से निकालकर बॉन्ड में डाल देगा. इससे बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ता है.
अब चूंकि ऊंची ट्रेजरी यील्ड का असर स्टॉक मार्केट की कंपनियों पर भी पड़ता है. उनके लिए ब्याज की लागत बढ़ सकती है और भविष्य के प्रॉफिट पर दबाव आ सकता है.खासकर उन कंपनियों के शेयरों पर ज्यादा असर पड़ सकता है जिनकी वैल्युएशन बहुत ऊंची है और जिनके बड़े मुनाफे की उम्मीद भविष्य में है. ऐसे में निवेशक ज्यादा जोखिम लेने की बजाय कम जोखिम वाले बॉन्ड को पसंद कर सकते हैं, जिससे शेयर बाजार पर दबाव बढ़ सकता है.
आम लोगों पर क्या असर?
ट्रेजरी यील्ड बढ़ने का असर आम लोगों पर भी होता है. क्योंकि आम लोगों के लिए सबसे पहले कर्ज महंगा होता है. क्योंकि ट्रेजरी यील्ड लंबे समय के कर्ज के लिए एक अहम बेंचमार्क है. अगर सरकार को 5% के आसपास ब्याज देना पड़ रहा है, तो बैंक और दूसरी वित्तीय कंपनियां भी कर्ज देते समय ज्यादा ब्याज मांग सकती हैं. इसका मतलब है कि नया होम लोन, कार लोन, या दूसरे लंबी अवधि के लोन महंगे हो सकते हैं.
जब लोन महंगे होते हैं, तो लोग लोन लेना कम कर सकते हैं, जब लोग खर्च कम करेंगे तो इसका असर इकोनॉमी पर आएगा. क्योंकि घर नहीं बिकेंगे, गाड़ियां नहीं बिकेंगी और दूसरा प्रोडक्ट की खरीद कम हो जाएगी तो अर्थव्यवस्था की ग्रोथ भी धीमी हो सकती है.

