Explainer: कारोबारियों में गिरफ्तारी, पेनल्टी, मुकदमेबाज़ी का डर होगा खत्म! जानिए GST काउंसिल में 5 बड़े फैसले और उनका असर

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GST Arrest Fear Ends: Here’s How the Council’s 5 Big Decisions Will Affect Your Business

GST काउंसिल की 57वीं बैठक में 8 अक्टूबर को कारोबारियों को राहत देने वाले कई अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है. खास तौर पर छोटे कारोबारियों के लिए पेनल्टी, नोटिस, गिरफ्तारी और टैक्स रिफंड से जुड़े नियमों में बदलाव की सिफारिश की गई है. इन प्रस्तावों के लागू होने पर कारोबारियों के लिए GST का पालन करना आसान हो सकता है, उनका पैसा कम समय तक फंसेगा और कारोबार बढ़ाने के रास्ते भी खुल सकते हैं. तो आइए, जानते हैं काउंसिल के 5 सबसे बड़े प्रस्ताव क्या हैं और इनका कारोबारियों पर क्या असर पड़ेगा.

1- GST में गिरफ्तारी के प्रावधान खत्म

फैसला: GST काउंसिल की बैठक में कारोबारियों को बड़ी राहत देते हुए काउंसिल ने CGST कानून की धारा 69 में गिरफ्तारी की शक्ति से जुड़े प्रावधान हटाने की सिफारिश को मंजूरी मिली है. इसके साथ अभियोजन (prosecution) की सीमा 1 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये की गई है, न्यूनतम सज़ा हटा दी गई है और सामान्य जुर्माना 25,000 से घटाकर 10,000 रुपये किया गया है.

असर: इससे GST अधिकारियों की गिरफ्तार करने की शक्ति पूरी तरह से खत्म हो जाएगी. टैक्स विवादों में गिरफ्तारी की आशंका घटेगी. सामान्य कंप्लायंस से जुड़ी गलतियों और गंभीर टैक्स अपराधों के बीच अंतर ज्यादा साफ हो सकता है. छोटे और मझोले कारोबारियों को सबसे ज़्यादा राहत मिलेगी, क्योंकि इनवॉइस, क्रेडिट की पात्रता या क्लासिफिकेशन जैसे विवादों में गिरफ्तारी का डर खत्म होगा. रजिस्ट्रेशन और ज़्यादातर रिफंड ऑटोमेटेड होंगे और 10,000 रुपये से कम की रकम पर नोटिस नहीं भेजे जाएंगे, जिससे कंप्लायंस
की लागत और अधिकारियों से सीधा सामना कम होगा.

GST से जुड़े मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाने की सीमा 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दी गई है. इसका मकसद छोटे कारोबारियों और व्यापारियों को टैक्स नियमों के उल्लंघन पर होने वाली सख्त कार्रवाई के डर से राहत देना और कारोबार करना आसान बनाना है. हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि GST चोरी करने वालों पर कार्रवाई खत्म हो जाएगी, टैक्स वसूली और कानून के तहत दूसरी कार्रवाई जारी रह सकती है.

2- GST रिफंड जल्दी मिलेगा

फैसला: रजिस्ट्रेशन और ज़्यादातर रिफंड अब सिस्टम से ऑटोमेट होंगे. कई कारोबारी खर्चों पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का फायदा भी बढ़ाया गया है. रिफंड की प्रक्रिया की शुरुआत भी तेज़ करने का प्रस्ताव है. अभी रिफंड का आवेदन देने के बाद विभाग को 15 दिन के भीतर बताना होता है कि आवेदन मिल गया है या उसमें कोई कमी है. अब इस समयसीमा को घटाकर 10 दिन करने का प्रस्ताव है.

असर: इससे कारोबारी को जल्दी पता चल जाएगा कि उसका आवेदन सही है या उसमें कुछ सुधारना है, और बेवजह इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा. ये कदम पहले से चल रही व्यवस्था को आगे बढ़ाता है. पिछले साल तय हुआ था कि जिन कारोबारियों का कच्चे माल पर टैक्स तैयार माल से ज़्यादा है, उन्हें रिफंड का 90% हिस्सा पहले ही दे दिया जाएगा. अब सरकार चाहती है कि जिन कारोबारियों का रिकॉर्ड साफ-सुथरा है, उन्हें सिस्टम खुद पहचानकर जल्दी रिफंड दे दे, ठीक वैसे ही जैसे इनकम टैक्स रिफंड मिलता है.

अब तक रिफंड में देरी की वजह से कारोबारियों का पैसा महीनों तक फंसा रहता था. पैसा अटकने से उन्हें कर्ज़ लेना पड़ता था, ब्याज भरना पड़ता था और कई बार माल खरीदने या मज़दूरों को पेमेंट देने में भी दिक्कत आती थी. रिफंड जल्दी मिलने से हाथ में नकदी रहेगी, कर्ज़ का बोझ घटेगा और रोज़ का काम बिना रुकावट चलेगा.

सबसे ज़्यादा फायदा छोटे कारोबारियों और निर्यातकों को होगा, क्योंकि उनके पास पैसे की पहले से तंगी रहती है. टेक्सटाइल और जूता-चप्पल जैसे उद्योग भी राहत महसूस करेंगे, जहां कच्चे माल पर टैक्स ज़्यादा लगता है.

3- हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस पर ITC

फैसला: GST काउंसिल ने कंपनियों को एक अहम राहत देने की सिफारिश की है. कर्मचारियों को दिए जाने वाले हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस, आउटडोर कैटरिंग और कुछ दूसरे खर्चों पर चुकाए गए GST का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) लेने पर अभी जो रोक है, उसे हटाने की बात कही गई है. ITC का मतलब है कि खरीदारी पर पहले जो टैक्स आपने चुकाया, उसे बाद में अपनी GST देनदारी में से घटा लेना.

असर: कानून की धारा 17(5) में कुछ चीज़ों की सूची है जिन पर चुकाए टैक्स का क्रेडिट कंपनियां नहीं ले सकतीं. इनमें लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस और आउटडोर कैटरिंग भी आते हैं. यानी कंपनी ने कर्मचारियों के लिए बीमा या किसी कारोबारी कार्यक्रम के लिए कैटरिंग पर GST दिया, फिर भी वह पैसा वापस नहीं मिलता और खर्च में जुड़ जाता है. कारोबारी लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि ये असल में कारोबार के ही खर्चे हैं, इसलिए इन पर क्रेडिट मिलना चाहिए.

अगर यह सिफारिश कानून बन जाती है, तो कारोबारी इन खर्चों पर चुकाए टैक्स का क्रेडिट लेकर अपनी कुल GST देनदारी घटा सकेंगे. यानी हर महीने सरकार को कम टैक्स जमा करना पड़ेगा और कंपनी के पास ज़्यादा पैसा बचेगा.

4- हर तिमाही GST भरने का विकल्प

फैसला: छोटे कारोबारियों के लिए एक नई वैकल्पिक व्यवस्था पर सैद्धांतिक सहमति दी गई है. इस व्यवस्था का नाम है Annual Return Quarterly Payment, यानी ARQP. सीधी भाषा में कहें तो इसमें रिटर्न पूरे साल का एक बार भरा जाएगा, जबकि टैक्स का भुगतान हर तिमाही में करना होगा.

असर: ये विकल्प उन कारोबारियों के लिए है जिनका सालाना कारोबार ₹5 करोड़ तक है और जो सिर्फ आम उपभोक्ताओं को सामान या सेवाएं बेचते हैं. यानी किराना, कपड़े या मोबाइल जैसी आम दुकानें, रेस्टोरेंट, सैलून और छोटे सर्विस प्रोवाइडर, जिनके ग्राहक सीधे आम लोग होते हैं, इस दायरे में आ सकते है.। ये व्यवस्था अनिवार्य नहीं, वैकल्पिक है। जिसे पुराना तरीका सही लगे, वह उसी पर चल सकता है. अभी छोटे दुकानदारों को बार-बार रिटर्न और भुगतान के झंझट से गुज़रना पड़ता है, जिसमें समय भी जाता है और अकाउंटेंट का खर्च भी लगता है.

5- दूसरे राज्यों में कारोबार आसानी से कर सकेंगे?

फैसला: GST काउंसिल ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर सामान बेचने वाले छोटे विक्रेताओं के लिए रजिस्ट्रेशन की एक आसान व्यवस्था की सिफारिश की है. इसमें तय शर्तों के तहत ई-कॉमर्स कंपनी के उस राज्य में मौजूद गोदाम को ही विक्रेता के Principal Place of Business (PPoB) यानी कारोबार का मुख्य स्थान घोषित किया जा सकेगा. इसका मतलब है कि सेलर को वहां अपनी अलग दुकान या दफ्तर नहीं दिखाना पड़ेगा.

असर: जब कोई विक्रेता अपना माल किसी दूसरे राज्य के गोदाम में रखवाता है, तो उस राज्य में भी उसे GST रजिस्ट्रेशन लेना पड़ता है. इसके लिए वहां कारोबार की जगह का पता और उससे जुड़े कागज़ात देने होते हैं, जैसे किराये का एग्रीमेंट. छोटे विक्रेता के लिए हर राज्य में ऐसी जगह दिखाना मुश्किल और खर्चीला हो जाता है. इसी वजह से कई छोटे कारोबारी अपना माल दूसरे राज्यों तक पहुंचाने से हिचकते हैं. ये बदलाव खासकर छोटे ब्रांड, घर पर सामान बनाने वाले कारोबारियों और ऑनलाइन बिज़नेस की शुरुआत करने वालों के लिए काम का हो सकता है. वे आसानी से देश के अलग-अलग हिस्सों के ग्राहकों तक पहुंच पाएंगे और उनके बाज़ार का दायरा बढ़ेगा.

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