सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी SIP के जरिए म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) में रेगुलर निवेश करना काफी सहूलियत भरा हो गया है. लेकिन सिर्फ SIP शुरू करने भर से काम नहीं चलता, SIP शुरू करने के लिए सही फंड का चुनाव करना सबसे ज्यादा जरूरी है. म्यूचुअल फंड मार्केट बहुत बड़ा है, हजारों स्कीम्स हैं, सभी के निवेश के तरीके, जोखिम और रिटर्न की संभावनाएं अलग-अलग होती हैं.
ऐसे में केवल किसी फंड के पिछले रिटर्न या उसकी लोकप्रियता के आधार पर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए. निवेशक को ये देखना चाहिए कि फंड आपके वित्तीय लक्ष्य, निवेश की अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता के अनुकूल है या नहीं. मतलब, अगर आपने कोई वित्तीय लक्ष्य तय कर रखा है, क्या वो फंड उस तय अवधि में हासिल कर सकता है. इसके लिए कोई फिक्स्ड फॉर्मूला तो नहीं है, लेकिन SIP के लिए म्यूचुअल फंड चुनने से पहले इन 12 बातों की जांच की जा सकती है. जो आपको एक सही म्यूचुअल फंड स्कीम को चुनने में मदद कर सकती है.
1- सबसे पहले अपना निवेश लक्ष्य और अवधि तय करें
म्यूचुअल फंड चुनने से पहले आपको ये पता होना चाहिए कि आप निवेश की शुरुआत कर क्यों रहे हैं, आपका लक्ष्य या मकसद क्या है. जैसे घर खरीदना चाहते हैं, बच्चों की पढ़ाई, बच्चों की शादी, रिटायरमेंट, विदेश घूमना चाहते हैं या कोई दूसरा बड़ा लक्ष्य है. इन लक्ष्यों का आप कब तक हासिल करना चाहते हैं यानी निवेश की अवधि क्या है. क्योंकि लक्ष्यों के हिसाब से निवेश की अवधि भी अलग अलग हो सकती है.
साथ ही. ये भी समझना जरूरी है कि बाजार में गिरावट आने पर आप कितना जोखिम उठा सकते हैं. अगर निवेश के दौरान अस्थायी नुकसान देखकर आप घबरा जाते हैं, तो ऐसा फंड चुनना आपके लिए मुश्किल हो सकता है जिसमें उतार-चढ़ाव ज्यादा हो. अगर आप बाजार में उतार चढ़ाव से ज्यादा परेशान नहीं होते हैं, तो फिर आप ऐसे फंड्स को चुन सकते हैं जिसमें रिस्क ज्यादा होता है और रिटर्न भी. मतलब ये कि आपको अपनी जोखिम लेने की क्षमता का सही तरीके से पहले आंकलन करना चाहिए.
2- पहले फंड की कैटेगरी चुनें, फिर स्कीम
म्यूचुअल फंड में कई तरह की कैटेगरीज होती हैं. उन कैटेगरी के निवेश के तरीके और जोखिम अलग होते हैं. जैसे
- इक्विटी
- डेट
- हाइब्रिड
- इंडेक्स
इक्विटी फंड खासतौर पर शेयर मार्केट में पैसा लगाते हैं, डेट फंड डेट इंस्ट्रीमेंट्स में निवेश करते हैं, जैसे- बॉन्ड्स, FD वगैरह और हाइब्रिड फंड शेयरों और डेट इंस्ट्रूमेंट्स दोनों में ही निवेश करते हैं, यानी इसमें इक्विटी और डेट का एक मिश्रण होता है. इंडेक्स फंड किसी तय इंडेक्स के प्रदर्शन को फॉलो करते हैं. जैसे निफ्टी इंडेक्स, सेंसेक्स इंडेक्स.
हमेशा ध्यान रखें कि अलग-अलग कैटेगरीज के स्कीम्स की सीधे तुलना करने के बजाय एक ही कैटेगरी की स्कीम्स की तुलना करना बेहतर रहता है. उदाहरण के लिए, किसी इक्विटी फंड की तुलना डेट फंड से केवल रिटर्न के आधार पर करना सही तरीका नहीं है.
हर कैटेगरी की निवेश प्रकृति और जोखिम-रिटर्न का स्वरूप अलग होता है. इसलिए निवेश का कोई भी विकल्प चुनने से पहले इन कैटेगरीज को अच्छी तरह समझ लें और अपने वित्तीय लक्ष्य, निवेश की अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता का आकलन ज़रूर करें, ताकि आप समझ सकें कि वो फंड आपके लक्ष्य के अनुकूल है या नहीं.
3- फंड का निवेश उद्देश्य और रणनीति समझें
हर म्यूचुअल फंड की एक तय निवेश रणनीति होती है. कुछ फंड बड़ी कंपनियों के शेयरों में निवेश करते हैं, कुछ मध्यम या छोटी कंपनियों पर ध्यान देते हैं, जबकि कुछ खास सेक्टर्स या निवेश शैली को प्राथमिकता देते हैं.
फंड के नाम से ही उसकी पूरी रणनीति का अंदाजा न लगाएं. उसकी निवेश नीति और पोर्टफोलियो देखें. ये भी जांचें कि फंड अपनी बताई गई रणनीति पर लगातार काम कर रहा है या समय के साथ उसके निवेश का तरीका काफी बदल गया है.
आप ये देखें कि फंड किन कंपनियों या इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करता है, उसके एसेट एलोकेशन के नियम क्या हैं, किस सेक्टर या मार्केट पर अपना फोकस रखता है. उसकी रणनीति आपके निवेश उद्देश्य से मेल खाती है या नहीं. अगर कोई भी मिसमैच होता है तो इसका आपकी SIP के रिटर्न पर असर पड़ सकता है.
4- केवल रिटर्न नहीं, उसका प्रदर्शन भी परखें
किसी फंड ने पिछले एक साल में कितना रिटर्न दिया, केवल इसी आधार पर उसे चुनना उचित नहीं है. एक साल का अच्छा प्रदर्शन किसी खास बाजार परिस्थिति की वजह से भी हो सकता है. म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में फंड का प्रदर्शन समझने के लिए CAGR, XIRR, IRR और रोलिंग रिटर्न जैसे कई पैमाने इस्तेमाल होते हैं. ये पैमाने फंड के पिछले प्रदर्शन को समझने में मदद करते हैं।कौन सा पैमाना कितना काम का है, यह निवेश के तरीके और निवेशक की ज़रूरत पर निर्भर करता है.
निवेश करने के तरीके के हिसाब से अलग-अलग पैमाने लागू होते हैं. जैसे SIP में किस्तें अलग-अलग तारीखों पर जाती हैं, इसलिए वहां आमतौर पर XIRR ज़्यादा उपयोगी रहता है. रिटर्न को आमतौर पर 1, 3, 5 या 10 साल जैसी तय अवधियों में देखें, साथ ही उसकी तुलना उसी कैटेगरी के दूसरे फंड और उसके तय बेंचमार्क से करें. बेंचमार्क वो इंडेक्स होता है, जिसके मुकाबले फंड के प्रदर्शन को देखा जाता है. SIP निवेशकों के लिए अलग-अलग समय अवधि में प्रदर्शन की निरंतरता समझना भी उपयोगी है. हालांकि, पिछला प्रदर्शन भविष्य में मिलने वाले रिटर्न की गारंटी नहीं देता.
5- फंड कितना जोखिम लेता है, यह भी समझें
ज्यादा रिटर्न देने वाले फंड में जोखिम भी ज्यादा हो सकता है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि फंड ने रिटर्न हासिल करने के लिए कितना उतार-चढ़ाव सहा है।
इसके लिए कुछ मापदंड उपयोगी हो सकते हैं। स्टैंडर्ड डिविएशन बताता है कि फंड के रिटर्न में कितना उतार-चढ़ाव रहा है। बीटा से पता चलता है कि फंड का प्रदर्शन बाजार की चाल के प्रति कितना संवेदनशील रहा। शार्प रेशियो यह समझने में मदद करता है कि फंड ने उठाए गए जोखिम के मुकाबले कितना रिटर्न दिया।
इसके अलावा, यह भी देखें कि बाजार में बड़ी गिरावट के दौरान फंड कितना नीचे गया और उसे पुराने स्तर तक लौटने में कितना समय लगा।
इन मापदंडों को अकेले देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। इनकी तुलना समान श्रेणी के फंड से करना ज्यादा उपयोगी है।
क्या जांचें: उतार-चढ़ाव, बाजार की गिरावट में प्रदर्शन और जोखिम के मुकाबले मिलने वाला रिटर्न।
6- पोर्टफोलियो में विविधता और निवेश की गुणवत्ता देखें
फंड का पोर्टफोलियो बताता है कि आपका पैसा वास्तव में कहां निवेश किया जा रहा है. इक्विटी फंड में यह देखें कि निवेश कुछ ही कंपनियों या सेक्टर्स में बहुत ज्यादा फोकस्ड तो नहीं है. मतलब सारा का सारा पैसा कहीं एक ही कंपनी या सेक्टर में तो नहीं लगा है, ऐसे में रिस्क बढ़ सकता है. ऐसे में डायवर्सिफिकेशन बड़े कमाल का हथियार होता है, जो पोर्टफोलियो से ऐसे जोखिमों को कम करता है. अलग-अलग सेक्टर में निवेश होने से आपका पोर्टफोलियो किसी एक पर निर्भर नहीं रहता.
इक्विटी फंड अपनी स्कीम के हिसाब से लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों में निवेश कर सकते हैं. फंड अपनी होल्डिंग का जो ब्योरा जारी करता है. उसमें मार्केट कैप का रेश्यो देखकर आप पोर्टफोलियो की बनावट समझ सकते हैं. फंड चुनने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि उसमें कौन-कौन से शेयर हैं.
डेट फंड में निवेश किए गए डेट इंस्ट्रूमेंट्स की क्रेडिट रेटिंग और उनसे जुड़े जोखिम पर ध्यान देंना चाहिए.ऊंची रेटिंग वाले बॉन्ड में आमतौर पर जोखिम कम माना जाता है, कम रेटिंग वाले बॉन्ड में जोखिम ज़्यादा हो सकता है.
अगर आपके पास पहले से कई म्यूचुअल फंड हैं, अपने अलग-अलग फंडों की होल्डिंग की आपस में तुलना करें. अगर कई फंड में एक जैसे शेयर हैं, तो डायवर्सिफिकेशन का फायदा घट जाता है.
7- फंड मैनेजर और उसकी स्ट्रैटजी पर नजर रखें
फंड मैनेजर निवेश से जुड़े फैसले लेने में अहम भूमिका निभाता है. इसलिए उसके अनुभव, संबंधित फंड के साथ काम करने की अवधि और अलग-अलग मार्केट हालातों में उसके फैसलों को समझना उपयोगी है.
ये भी देखें कि फंड की निवेश रणनीति में बार-बार बदलाव तो नहीं हुआ है. हालांकि, केवल लंबे अनुभव या किसी एक अच्छे प्रदर्शन के आधार पर फंड को बेहतर नहीं माना जा सकता. फंड मैनेजर की भूमिका को फंड के प्रदर्शन, जोखिम और निवेश नीति के साथ मिलाकर देखना चाहिए.
8- एक्सपेंस रेश्यो पर ध्यान दें
एक्सपेंस रेश्यो वो सालाना खर्च है, जो म्यूचुअल फंड कंपनियां आपसे लेती हैं. ये खर्च फंड की परिसंपत्तियों से पूरा किया जाता है और इसका असर निवेशक के वास्तविक रिटर्न पर पड़ता है. लंबी अवधि के निवेश में खर्च का असर समय के साथ बढ़ सकता है. इसलिए समान कैटेगरी के फंड की तुलना करते समय एक्सपेंस रेश्यो जरूर देखें. हालांकि, सिर्फ कम खर्च वाला फंड चुनना भी पर्याप्त नहीं है. उसके प्रदर्शन, जोखिम और निवेश रणनीति को भी परखना चाहिए.
9- फंड साइज और खरीद-बिक्री की गतिविधि
फंड के एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) से पता चलता है कि स्कीम कितनी एसेट्स को मैनेज कर रही है. फंड का साइज अपने आप में उसकी गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है, लेकिन कुछ कैटेगरीज में इसका असर निवेश के अवसरों और पोर्टफोलियो को संभालने की क्षमता पर पड़ सकता है.
इसके साथ पोर्टफोलियो टर्नओवर रेश्यो भी देखा जा सकता है. ये बताता है कि फंड अपने पोर्टफोलियो में रखी सिक्योरिटीज को कितनी बार खरीदता और बेचता है. ज्यादा टर्नओवर का मतलब अधिक खरीद-बिक्री है, लेकिन ये अपने आप में खराब प्रदर्शन का संकेत नहीं है. इसे फंड की रणनीति और अन्य खर्चों के साथ समझना चाहिए
10- एग्जिट लोड के नियम समझें
SIP शुरू करने से पहले ये जानना भी जरूरी है कि जरूरत पड़ने पर निवेश से पैसा निकालने की शर्तें क्या हैं. कुछ स्कीम्स में तय अवधि से पहले पैसा निकालने पर एग्जिट लोड लग सकता है. कुछ कैटेगरीज में लॉक-इन अवधि भी होती है, जिसके दौरान पैसा निकालने पर पाबंदी रहती है. निवेश की योजना बनाते समय ये तय करें कि आपका पैसा कब उपलब्ध हो सकता है और समय से पहले निकासी पर कितना खर्च लग सकता है.
11- टैक्स के नियमों को नजरअंदाज न करें
म्यूचुअल फंड से मिलने वाले लाभ पर टैक्स उसकी श्रेणी, निवेश की अवधि और लागू कर नियमों पर निर्भर करता है. इक्विटी और डेट फंड के लिए टैक्स के नियम अलग हो सकते हैं और इनमें बदलाव भी हो सकता है.
इसलिए निवेश करने से पहले ये समझ लें कि पैसा निकालने पर संभावित लाभ पर किस तरह टैक्स लग सकता है. केवल कुल रिटर्न देखकर फैसला करने के बजाय टैक्स के बाद मिलने वाले रिटर्न को भी ध्यान में रखें.
12- नया फंड आपके पोर्टफोलियो में क्या जोड़ेगा
अगर आप पहले से म्यूचुअल फंड में पैसा लगा रहे हैं, तो नई SIP शुरू करने से पहले एक सवाल ज़रूर पूछें कि ये नया फंड मेरे पोर्टफोलियो में ऐसा क्या जोड़ेगा, जो पहले से नहीं है? मान लीजिए आपके मौजूदा फंड पहले से वही कंपनियां, वही सेक्टर या बाज़ार का वही हिस्सा कवर कर रहे हैं. ऐसे में उन्हीं से मिलता-जुलता एक और फंड जोड़ने से खास फायदा नहीं होगा. आपके पैसे की संख्या फंड्स में बंट जाएगी, पर जोखिम उतना ही बना रहेगा. इसलिए फंड सिर्फ इसलिए न चुनें कि उसने हाल में अच्छा रिटर्न दिया है या वो आजकल चर्चा में है. देखें कि वह आपके पोर्टफोलियो की कमी पूरी करता है या नहीं.
SIP के लिए म्यूचुअल फंड चुनते समय कोई एक मापदंड अंतिम फैसला नहीं कर सकता. अच्छा पिछला रिटर्न, कम एक्सपेंस रेश्यो या बड़ा फंड साइज अपने आप में निवेश की सफलता की गारंटी नहीं है. बेहतर तरीका ये है कि पहले अपने लक्ष्य और जोखिम की क्षमता तय करें, फिर समान कैटेगरी के फंड की तुलना करें और उनके प्रदर्शन, पोर्टफोलियो, लागत और जोखिम को एक साथ परखें.ध्यान रखें, SIP निवेश का एक तरीका है, अपने आप में कोई अलग निवेश उत्पाद नहीं है. म्यूचुअल फंड बाजार के जोखिम के अधीन हैं. निवेश से पहले संबंधित योजना के दस्तावेज पढ़ें और अपनी वित्तीय स्थिति के अनुरूप फैसला लें.

