सिर्फ धुंआ नहीं, टायर और ब्रेक भी प्रदूषण के दायरे में! BS-VII नियमों का बड़ा प्रस्ताव: 3 चरणों में होंगे लागू
सिर्फ धुंआ नहीं, टायर और ब्रेक भी प्रदूषण के दायरे में! BS-VII नियमों का बड़ा प्रस्ताव: 3 चरणों में होंगे लागू
प्रदूषण को कम करने की दिशा में सरकार की ओर से एक नया ड्राफ्ट जारी हुआ है. अभी तक कारों और ट्रकों को ही प्रदूषण का जिम्मेदार माना जाता था और सख्तियां लागू की जाती थीं, मगर नए ड्राफ्ट के तहत कार, पिकअप, डिलीवरी वैन, बस और ट्रक समेत लगभग सभी तरह की नई गाड़ियों के लिए प्रदूषण की सीमा और कड़ा करने का प्रस्ताव है.
सबसे नई बात इसमें ये है कि नए नियमों में सिर्फ इंजन से निकलने वाले धुएं की जांच नहीं होगी, बल्कि ब्रेक और टायर घिसने से निकलने वाले बारीक कणों पर भी नजर रखी जाएगी.
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ओर से तीन नोटिफिकेशंस जारी किए गए हैं. प्रस्ताव के मुताबिक, भारत स्टेज-VII (BS-VII) नियम अलग-अलग तरह की गाड़ियों के लिए चरणबद्ध तरीके से लागू होंगे.
क्या है BS-VII और क्यों बदल रहे हैं नियम?
BS-VII गाड़ियों से निकलने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए नया मानक है, हालांकि अभी ये प्रस्तावित है. इसमें कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और बारीक कणों जैसे प्रदूषकों की सीमा तय की गई है. इनकी मात्रा तय सीमा से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.
नए नियमों की खास बात यह है कि गाड़ी को सिर्फ लैब में जांच पास करना काफी नहीं होगा. सड़क पर चलने के दौरान भी उसके प्रदूषण की जांच की जाएगी. इससे ये पता लगाने में मदद मिलेगी कि गाड़ी असल परिस्थितियों में कितना प्रदूषण फैला रही है. मतलब ये कि अगर कोई गाड़ी लैब टेस्ट में तो OK है, लेकिन सड़क पर वो प्रदूषण करती है, तो उसकी जांच की जाएगी. ध्यान रहे कि ये नियम नई गाड़ियों पर लागू होंगे. पहले से सड़कों पर चल रही पुरानी गाड़ियों पर इनका सीधा असर नहीं पड़ेगा.
कब से लागू होंगे नियम?
सरकार ने अलग-अलग कैटेगरी की गाड़ियों के लिए अलग समयसीमा का प्रस्ताव दिया है. इससे ऑटो कंपनियों को नई तकनीक अपनाने और प्रोडक्शन की तैयारी के लिए समय मिलेगा. किस कैटेगरी के लिए क्या समयसीमा है, वो नीचे दिया गया है
- कारों के लिए ये नियम 1 अप्रैल 2029 से लागू होंगे
- छोटे मालवाहकों के लिए 1 अप्रैल 2030 से लागू होंगे
- बस, मिड साइज, भारी ट्रकों के लिए 1 अप्रैल 2031 से
इस तरह सबसे पहले यात्री कारें नए नियमों के दायरे में आएंगी. छोटे मालवाहक वाहनों के लिए ये नियम एक साल बाद और बसों और ट्रकों के लिए 2031 से लागू करने का प्रस्ताव है.
धुएं से जुड़े नियम होंगे सख्त
इस ड्राफ्ट में गाड़ियों से निकलने वाले प्रदूषकों (Pollutants) की अधिकतम सीमा तय की गई है. पैसेंजर व्हीकल्स के लिए पेट्रोल इंजन से निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड की सीमा 1,000 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर और डीजल इंजन के लिए 500 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर रखी गई है
इसी तरह, नाइट्रोजन ऑक्साइड की सीमा पेट्रोल कारों के लिए 60 और डीजल कारों के लिए 80 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर रखी गई है. बारीक कणों की सीमा 4.5 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर है.
बसों और ट्रकों के लिए प्रदूषण की सीमा अलग तरीके से तय होगी. इसमें इंजन से निकलने वाले प्रदूषण को उसकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता के हिसाब से मापा जाएगा. प्रस्ताव के मुताबिक, लैब में नाइट्रोजन ऑक्साइड की सीमा 200 मिलीग्राम और बारीक कणों की सीमा 8 मिलीग्राम होगी
सिर्फ लैब टेस्ट काफी नहीं!
अब गाड़ियों की जांच केवल लैब तक ही सीमित नहीं होगी, बल्कि गाड़ियों को असली में सड़क पर चलाकर भी उसके प्रदूषण की मात्रा मापी जाएगी. इसके लिए गाड़ी में एक पोर्टेबल उपकरण लगाया जाएगा, जो चलते समय निकलने वाले प्रदूषण को दर्ज करेगा. इससे उन गाड़ियों की पहचान करना आसान होगा, जो लैब में तय मानकों पर तो खरा उतरती हैं, लेकिन सड़क पर ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं. बसों और ट्रकों के लिए सड़क पर जांच के दौरान कुछ प्रदूषकों की सीमा प्रयोगशाला के मुकाबले अधिक रखी गई है. उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन ऑक्साइड की सीमा 260 मिलीग्राम प्रस्तावित है.
ब्रेक और टायर से निकलने वाले कणों पर भी नजर
नए प्रस्ताव में पहली बार ब्रेक घिसने और टायर सड़क पर रगड़ खाने से निकलने वाले बारीक कणों को भी नियमों के दायरे में लाने की बात कही गई है और ऐसा प्रस्ताव पहली बार दिया गया है. कारों के ब्रेक से निकलने वाले कणों के लिए नियम 1 अप्रैल 2031 से लागू करने का प्रस्ताव है. इलेक्ट्रिक कारों के लिए इसकी सीमा 3 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर और दूसरी कारों के लिए 7 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर रखी गई है. 2035 से सभी कारों के लिए 3 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर की समान सीमा प्रस्तावित है. टायर घिसने से निकलने वाले कणों और भारी वाहनों के ब्रेक के लिए सीमा अभी तय नहीं की गई है. मंत्रालय इस बारे में बाद में अलग से जानकारी दे सकता है.
गाड़ी में लगे सिस्टम खुद पकड़ेंगे प्रदूषण
सरकार की ओर से दिए गए प्रस्ताव के मुताबिक, गाड़ियों में ऐसे सिस्टम लगाने होंगे, जो खराबी का पता लगाने के साथ प्रदूषण और ईंधन की खपत पर भी नजर रखेंगे. एक सिस्टम गाड़ी के अलग-अलग हिस्सों में आई खराबी का पता लगाएगा, दूसरा प्रदूषण की निगरानी करेगा और तय सीमा से 2.5 गुना या उससे ज्यादा प्रदूषण होने पर इसकी पहचान करेगा. तीसरा सिस्टम गाड़ी में ईंधन या बिजली की वास्तविक खपत का रिकॉर्ड रखेगा.
बसों और ट्रकों में लदे सामान का वजन भी दर्ज करने की व्यवस्था होगी. शुरुआत में ये जानकारी गाड़ी के जांच पोर्ट के जरिए हासिल की जा सकेगी. बाद में इसे बिना तार के भी भेजने की सुविधा दी जा सकती है.
कई साल तक खरा उतरना होगा
नए नियमों के तहत कंपनियों की जिम्मेदारी सिर्फ गाड़ी बेचने तक सीमित नहीं रहेगी. गाड़ी को लंबे समय तक तय प्रदूषण मानकों का पालन करना होगा. प्रस्ताव में कारों के लिए यह अवधि 8 साल या 1.6 लाख किलोमीटर रखी गई है. मझोले ट्रकों और बसों के लिए 8 साल या 3 लाख किलोमीटर, जबकि 16 टन से ज्यादा वजन वाले ट्रकों के लिए 12 साल या 7 लाख किलोमीटर की सीमा प्रस्तावित है. इसके बाद भी तय अतिरिक्त अवधि में गाड़ियों की जांच की जाएगी. इससे कंपनियों को ऐसी तकनीक और उपकरण इस्तेमाल करने होंगे, जो लंबे समय तक सही तरीके से काम कर सकें
‘पर्यावरण पासपोर्ट’ मिलेगा
प्रस्ताव में गाड़ी के साथ एक ‘पर्यावरण पासपोर्ट’ देने की व्यवस्था भी शामिल है. इसमें ईंधन की खपत, बैटरी की स्थिति और प्रदूषण से जुड़ी जानकारी दर्ज होगी. इसे गाड़ी के अंदर भी दिखाया जा सकेगा. इससे ग्राहकों को गाड़ी की वास्तविक स्थिति और उसके प्रदर्शन को समझने में मदद मिल सकती है. खासकर पुरानी गाड़ी खरीदते समय ऐसी जानकारी उपयोगी हो सकती है, हालांकि इसका वास्तविक फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि ये आंकड़े किस तरह उपलब्ध कराए जाते हैं.
इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी के लिए भी सीमा
प्रस्ताव में इलेक्ट्रिक और प्लग-इन हाइब्रिड कारों की बैटरी की क्षमता को लेकर भी शर्तें रखी गई हैं. इसके मुताबिक, शुरुआती 5 साल या 1 लाख किलोमीटर तक बैटरी की क्षमता कम से कम 75% बनी रहनी चाहिए. वहीं, 8 साल या 1.6 लाख किलोमीटर तक यह क्षमता कम से कम 67 प्रतिशत रखने का प्रस्ताव है.
इसका मकसद बैटरी की क्षमता में समय के साथ आने वाली गिरावट पर नजर रखना और ग्राहकों को उसकी स्थिति की जानकारी देना है. इथेनॉल से चलने वाली गाड़ियों पर भी लेबल जरूरी होगा. अगर कोई गाड़ी 20% से ज्यादा इथेनॉल मिले पेट्रोल पर चल सकती है, तो उस पर इसकी जानकारी देने वाला स्पष्ट लेबल लगाना होगा. इससे ग्राहकों को पता चलेगा कि उनकी गाड़ी कितने प्रतिशत इथेनॉल मिले पेट्रोल का इस्तेमाल कर सकती है। इससे गलत ईंधन के इस्तेमाल से बचने में भी मदद मिल सकती है।
बढ़ेगी ऑटो कंपनियों की लागत!
BS-VII नियम लागू होने पर वाहन कंपनियों को इंजन, प्रदूषण नियंत्रण उपकरण, सेंसर और निगरानी सिस्टम में बदलाव करने पड़ सकते हैं. इसके अलावा, नई तकनीक का परीक्षण और लंबे समय तक उसके सही काम करने की पुष्टि भी जरूरी होगी.
इससे कंपनियों का R&D और उत्पादन लागत बढ़ सकता है. कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च का कुछ हिस्सा गाड़ियों की कीमत में शामिल कर सकती हैं. नए नियम पेट्रोल, डीजल, CNG, LPG, इथेनॉल, मेथनॉल, हाइड्रोजन, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर लागू करने का प्रस्ताव है. यानी नियम किसी एक ईंधन या तकनीक तक सीमित नहीं रहेंगे.
ड्राफ्ट में जियोफेंसिंग तकनीक वाली गाड़ियों के लिए ‘BS-VII-G’ नाम की अलग कैटेगरी का भी प्रस्ताव है. इसके अलावा, कंपनियों को उत्पादन के दौरान भी तय मानकों का पालन करना होगा. इसके लिए किसी तरह की छूट नहीं देने की बात कही गई है.
30 दिन के भीतर देने होंगे सुझाव
सरकार ने फिलहाल BS-VII नियमों का मसौदा जारी किया है. यह अभी अंतिम फैसला नहीं है. आम लोग, ऑटो कंपिनयां और दूसरी इससे जुड़ी हुई कंपनियां डाफ्ट सार्वजनिक होने के 30 दिन के भीतर अपने सुझाव भेज सकती हैं.

