आज 20 जुलाई से संसद का मॉनसून सत्र शुरू हो चुका है, जो 13 अगस्त तक चलेगा. सरकार इस सत्र में कई अहम बिल पेश करने वाली है. इसमें से एक है Income-tax (Amendment) Bill, 2026, जो कि Income Tax (Amendment) Ordinance, 2026 की जगह लेगा. इस बिल का सीधा कनेक्शन कमजोर होते रुपये और विदेशी निवेशकों से है. तो चलिए एक-एक करके समझते हैं कि ये बिल क्या है, क्यों लाया जा रहा है, और इसका असर क्या होगा?
बिल क्या है?
भारत के कानून के मुताबिक कोई भी ऑर्डिनेंस अस्थायी होता है, संसद सत्र शुरू होने के बाद उसे तय समयसीमा के भीतर बिल के रूप में पास कराना जरूरी होता है, वरना वो ऑर्डिनेंस अपने-आप खत्म हो जाता है. यही वजह है कि अब इस ऑर्डिनेंस को स्थायी कानून की शक्ल देने के लिए बिल संसद में पेश हो रहा है. मतलब ये बिल जून 2026 में जारी हुए एक ऑर्डिनेंस (Income Tax Amendment Ordinance, 2026) की जगह लेगा.
ऑर्डिनेंस में प्रावधान है कि विदेशी निवेशकों (FIIs) और BIS (Bank for International Settlements) को भारत सरकार के सरकारी बॉन्ड यानी गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (G-Secs) में निवेश पर मिलने वाली ब्याज आय और कैपिटल गेन पर इनकम टैक्स से पूरी तरह छूट दी गई है. जो कि 1 अप्रैल 2026 से लागू है.
पहले विदेशी निवेशकों पर 12 महीने से ज्यादा होल्ड किए गए बॉन्ड पर 12.5% लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स, और ब्याज आय पर 20% विदहोल्डिंग टैक्स लगता था. ऑर्डिनेंस के बाद ये दोनों खत्म हो गए. इसे लेकर 5 जून 2026 को एक गजट नोटिफिकेशन जारी किया गया था और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आर्टिकल 123 के तहत इस पर दस्तखत किए थे, क्योंकि उस वक्त संसद का सत्र नहीं चल रहा था.
इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार इस आॉर्डिनेंस को इसलिए लेकर आई थी, क्योंकि वो तेज़ी से गिरते रुपये को संभालना चाहती थी. 2026 में अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 7% टूट चुका है, जिससे ये इस साल एशिया की सबसे कमजोर करेंसी में से एक बन गया.
20 मई 2026 को रुपया ₹96.86-₹96.965 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था. इसके पीछे दो बड़ी वजहें रहीं. पहली, मिडिल ईस्ट संकट के चलते क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल, जिससे भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ गया और दूसरी, विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली.
NSDL के डेटा के मुताबिक, 2026 की शुरुआत से अबतक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से करीब 28 बिलियन डॉलर निकाले हैं, जबकि पूरे 2025 में ये आंकड़ा 18.9 बिलियन डॉलर था.
मतलब ये कि महंगे कच्चे तेल और विदेशी निवेशकों के भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसे निकालने की वजह से रुपया कमजोर होता चला गया. सरकार इन दोनों को रोकना चाहती थी. सरकार का मकसद इस टैक्स छूट के जरिए विदेशी पूंजी को वापस भारत की तरफ खींचना और रुपये को सहारा देना है.
इससे क्या बदलेगा?
सरकारी बॉन्ड में निवेश करने वाले विदेशी संस्थागत निवेशकों की टैक्स के बाद मिलने वाली असल कमाई बढ़ जाएगी, जो अभी तक भारतीय बॉन्ड को कम आकर्षक बनाती थी.
सरकार की मंशा है कि सॉवरेन डेट मार्केट में ज्यादा और स्थिर विदेशी पूंजी आए.
सरकार के इस कदम के शुरुआती संकेत अच्छे आए, Clearing Corporation of India के डेटा के मुताबिक, ऐलान के बाद FAR रूट के तहत FPI होल्डिंग 3 जून के 3.23 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 10 जून को 3.32 लाख करोड़ हो गई, यानी करीब 8,795 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी.

