84 डॉलर पहुंचा क्रूड, एक दिन में 6.5% से ज्यादा टूटा; US-ईरान में बात बनने की उम्मीद

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Crude slips to 84, tumbles over 6 percent in a day as US-Iran de-escalation hopes rise

तीन हफ्ते की तेज़ी के बाद कच्चे तेल के उबाल में कमी आई है. अमेरिका और ईरान के बीच पिछले करीब दो हफ्तों से जारी सैन्य तनाव के बीच जिस कच्चे तेल ने 100 डॉलर प्रति बैरल की ऊंचाई को छुआ था, सोमवार को ब्रेंट क्रूड 6% से ज्यादा टूटकर 85 डॉलर के नीचे फिसल गया.WTI क्रूड भी 83 डॉलर के नीचे चला गया है. ये गिरावट इसलिए अहम है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में बाजार में जो ‘वॉर प्रीमियम’ मिल रहा था, अब वो खत्म होता हुई दिखाई दे रहा है.

क्रूड क्यों गिरा?

कच्चे तेल की कीमतों में आई इस गिरावट का संबंध डिमांड-सप्लाई से ज्यादा जियोपॉलिटिकल स्थितियों से है, जो अमेरिका और ईरान के बीच जंग की वजह से मिडिल ईस्ट में बनी है. बाज़ार की नजर इन दोनों देशों के बीच शांति समझौते के लिए होने वाली बातचीत पर टिकी है. बाज़ार को लगता है कि दोनों देश बातचीत कर रहे हैं और तनाव कम हो रहा है.

दरअसल, अमेरिका ने लगातार 13 रातों तक चले हमलों के बाद अपने बमबारी अभियान को फिलहाल रोकने का फैसला किया है. बीते दो दिनों से ने तो अमेरिका ने कोई हमला किया है और न ही ईरान ने कोई कार्रवाई की है. अमेरिका की ओर से कहा गया है कि वो कूटनीतिक कोशिशों के जरिए मौका देना चाहता है.

इसके जवाब में ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी संकेत दिया कि जब तक अमेरिका हमले नहीं करता, तब तक तेहरान भी जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा. साथ ही खबरें यह भी हैं कि चीन दोनों देशों के बीच रुकी हुई शांति वार्ता को फिर से शुरू कराने की कोशिश कर रहा है. यही वजह है कि निवेशकों ने तेल में मिल रहे ‘वॉर प्रीमियम’ को तेजी से निकालना शुरू कर दिया.

वॉर प्रीमियम क्या होता है?

जब भी किसी ऐसे क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ता है, जहां से दुनिया को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल मिलता है, तब बाजार इस आशंका को कीमतों में जोड़ देता है कि भविष्य में सप्लाई पर असर पड़ सकता है. इसको वॉर प्रीमियम कहते हैं. जहां तक मिडिल ईस्ट का सवाल है, ये दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल किया जाता है. इसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बड़ा रोल है, जहां से ग्लोबल सप्लाई का 20 % तेल गुजरता है. ये एक बेहद अहम समुद्री रास्ता है, अगर यहां से तेल की सप्लाई बाधित होती है तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई पर असर पड़ता है, इसलिए तेल की कीमतें तेजी से चढ़ जाती हैं. जैसे ही तनाव कम होने के संकेत मिलते हैं, अतिरिक्त प्रीमियम तेजी से निकलने लगता है. ये ऐसे ही काम करता है.

पिछले हफ्ते 100 डॉलर क्यों पहुंचा तेल?

दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के अलावा लाल सागर या Red Sea का भी वॉर प्रीमियम में बड़ा रोल है. पिछले हफ्ते इस बात का खतरा बढ़ गया था कि ये तनाव रेड सी तक पहुंच सकता है. इसलिए तेल कीमतें 100 डॉलर के पार चली गईं. इसको ऐसे समझिए कि अगर तेल कीमतों को बढ़ाने में 80% हाथ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का है तो बाकी 20% का कारण रेड सी है. मगर, अब कूटनीतिक बातचीत की उम्मीद बढ़ने से बाजार ने उसी तेजी को वापस निकाल दिया.

8 अप्रैल को जब अमेरिका और ईरान ने दो हफ्ते के सशर्त संघर्षविराम पर सहमति जताई थी, तब ब्रेंट क्रूड में एक ही दिन में करीब 13 से 16% की गिरावट आई थी, जो उस समय 2020 के बाद की सबसे तेज इंट्राडे गिरावट मानी गई. हालांकि ये संघर्षविराम ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाया. दोनों ही देश फिर एक दूसरे से लड़ने लगे, जिससे तेल कीमतें ऊपर चली गईं.

इसके बाद 18 जून को अमेरिका और ईरान ने संघर्ष को खत्म करने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद जून में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव करीब 85 डॉलर प्रति बैरल रहा, जो मई के मुकाबले 22 डॉलर कम था. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक, मई का महीना कोविड-19 महामारी के बाद ऑयल मार्केट के लिए सबसे खराब महीना रहा था, जब ब्रेंट क्रूड में करीब 19% की गिरावट आई थी.

जुलाई की शुरुआत में कीमतें और नीचे गिरकर 70 डॉलर प्रति बैरल से भी कम हो गई थीं, यानी लगभग वहीं, जहां फरवरी में संघर्ष शुरू होने से पहले थीं, लेकिन जुलाई के महीने में संघर्ष फिर भड़क उठा और होर्मुज से लेकर लाल सागर तक सप्लाई बाधाएं फैलने से कीमतों में करीब 40% की तेजी आई, जिसने ब्रेंट को दोबारा 100 डॉलर के करीब पहुंचा दिया.

जियो-पॉलिटिक्स से क्रूड का पुराना रिश्ता

जियो पॉलिटिकल संकट खत्म होने या कम होने के बाद तेल में इतनी तेज गिरावट कोई नई बात नहीं है. 1991 के खाड़ी युद्ध (Gulf War) के दौरान वॉर रिस्क खत्म होने पर तेल में तेज बिकवाली देखी गई थी. मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी और सऊदी अरब-रूस प्राइस वॉर के दौरान एक ही दिन में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में 20% से ज्यादा की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज हुई थी.
अप्रैल 2026 में भी अमेरिका-ईरान युद्धविराम की खबर आने के बाद ब्रेंट में करीब 13% तक की एक दिन में ही गिरावट देखी गई थी, जिसे कोविड काल के बाद सबसे बड़ी गिरावटों में माना गया.
यानी इतिहास बताता है कि जब तेल की कीमतें केवल जंग की वजह से बढ़ती हैं, तो शांति की उम्मीद बनते ही वही तेजी बहुत तेजी से खत्म भी हो जाती है.

क्या अब तेल की चिंता खत्म हो गई?

अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि तेल की चिंता खत्म हो गई. हालांकि अमेरिका और ईरान ने फिलहाल हमले रोक दिए हैं, लेकिन सप्लाई को लेकर कई बड़े जोखिम अभी भी बने हुए हैं. बाज़ार ये मानकर चल रहा है कि 1-2 दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच आधिकारिक बातचीत का ऐलान होगा. तभी जाकर तस्वीर साफ होगी. क्योंकि एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जल्द से जल्द इस युद्ध से बाहर निकलना चाहते हैं, ईरान भी अब ज्यादा लड़ाई के मूड में नहीं है. इसलिए बातचीत की टेबल पर आने का रास्ता दोनों ही खोज रहे हैं. हालांकि दोनों पक्षों ने ये भी चेतावनी दी है कि अगर बातचीत टूटती है, तो वे फिर से सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हैं.

इस तरह देखा जाए तो पिछले पांच महीनों में तेल बाजार ने कम से कम चार बड़े उतार-चढ़ाव झेले हैं — हर बार संघर्षविराम की उम्मीद पर तेज गिरावट, और हर बार तनाव दोबारा भड़कने पर उतनी ही तेज तेजी। विश्लेषकों का मानना है कि यह पैटर्न इस बात का संकेत है कि बाजार अब तक इस भू-राजनीतिक जोखिम को स्थायी मानने के बजाय एक अस्थायी झटके के रूप में देख रहा है, जो कूटनीतिक हलचल के साथ तेजी से पलट सकता है।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से ज्यादा कच्चा तेल इंपोर्ट करता है. क्रूड सस्ता होने पर भारत का इंपोर्ट बिल कम होता है, इसलिए ये भारत के लिए हर तरीके से अच्छा है. देश की तेल मार्केटिंग कंपनियों का घाटा कम होता है. इससे आगे चलकर पेट्रोल-डीजल के दाम घटने की उम्मीद जागती है.

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