सोने की कीमतों (Gold Prices) पर एक बार फिर से दबाव देखने को मिल रहा है, इसकी सबसे बड़ी वजह है अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता और महंगाई बढ़ने की आशंका. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार दोनों ही जगहों पर सोने की चमक फीकी पड़ी है.
घरेलू मार्केट में MCX पर सोने का अगस्त वायदा मंगलवार को दोपहर 2 बजकर 30 मिनट के करीब 1,600 रुपये प्रति 10 ग्राम से ज्यादा की गिरावट के साथ 1,45,240 रुपये प्रति 10 ग्राम पर ट्रेड कर रहा था. सोमवार को भी सोना करीब 460 रुपये की हल्की गिरावट के साथ 1,46,917 पर बंद हुआ था. घरेलू वायदा बाज़ार में सोना इस हफ्ते दो दिनों में अबतक 2,000 रुपये से ज्यादा टूट चुका है.
घरेलू मार्केट में भी सोना वायदा में 0.75% की गिरावट है और ये 4,135 डॉलर प्रति आउंस के इर्द-गिर्द ट्रेड कर रहा है. सोना आज यानी मंगलवार को ही 50 डॉलर प्रति आउंस से ज्यादा कमजोर हो चुका है. मगर बीते एक हफ्ते में सोने में जोरदार तेज़ी देखने को मिली थी, पूरे जून महीने में लगातार 4 हफ्ते गिरावट के बाद, पिछले हफ्ते सोने में करीब 2.5% की बढ़त आई है, ये 4 हफ्तों की गिरावट के बाद पहली साप्ताहिक बढ़त थी, क्योंकि अनुमान से कमजोर आए जून के जॉब्स डेटा से फेड की ब्याज दर बढ़ोतरी की उम्मीदें कम हुई.
जून में सिर्फ 57,000 नौकरियां जुड़ीं, जबकि अनुमान करीब 1,10,000 का था.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर तनाव
लेकिन अब ऐसा क्या हो गया है कि सोना लगातार फिसल रहा है. जबकि पिछले हफ्ते तक बाज़ार ये मान रहा था कि स्थितियां अब काफी हद तक सोने के पक्ष में हैं. दरअसल, सोने में आ रही इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह महंगाई बढ़ने का डर है और ब्याज दरों को लेकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व क्या फैसला लेता इसके इर्द-गिर्द मंडराती अनिश्चितता है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिति अब भी पूरी तरह से सुधरी नहीं है. यहां एक जहाज पर हमले की खबरों ने एनर्जी सप्लाई को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं. अगर ऊर्जा को लेकर संकट पैदा हुआ तो- महंगाई बढ़ने की आशंका भी मजबूत होगी. इससे अमेरिकी डॉलर मजबू़ती होगा, जिसका सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ेगा. क्योंकि विदेशी खरीदारों के लिए सोना खरीदने की लागत बढ़ जाएगी, जिससे डिमांड गिरेगी और सोने की कीमतें भी नीचे आएंगी.
फेड के मिनट्स पर नज़र
अब बाजार की नजरें जून में हुई फेड की बैठक के मिनट्स पर है, जो कि 8 जुलाई यानी बुधवार को जारी होंगे. जिससे इस बात का इशारा मिलेगा कि फेड ब्याज दरों को लेकर क्या फैसला ले सकता है, भविष्य में उसकी रणनीति क्या हो सकती है. फेड के नए चेयरमैन केविन वार्श की टिप्पणियों पर भी ध्यान देना होगा कि उनका अपना नजरिया क्या है.
हालांकि वार्श पहले ही साफ कर चुके हैं कि फेड महंगाई को 2% के लक्ष्य पर लाने के लिए प्रतिबद्ध है. ऐसे में यदि महंगाई ऊंची बनी रहती है तो ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रखा जा सकता है.
महंगाई सबसे बड़ा दर्द
बाजार की चिंता इसी बात को लेकर है कि महंगाई आसानी से नीचे आती हुई नहीं दिख रही है, कच्चा तेल एक बार फिर 73 डॉलर के ऊपर पहुंच गया है. ऐसे में अगर महंगाई ऊंची बनी रहती है तो ब्याज दरें भी लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं. जिसकी वजह से डॉलर मजबूत बना हुआ है और सोना फिर दबाव में आ गया है. इस बार 14 जुलाई को CPI यानी रिटेल महंगाई के डेटा आएंगे.
रिटेल महंगाई के डेटा पर फेड की नजरें रहेंगी, इसका असर 28-29 जुलाई को होने वाली फेड की अगली बैठक पर दिख सकता है. बाजार ये मानकर चल रहा है कि जुलाई की बैठक में दरें बिना बदलाव के ही रहेंगी.
इसका अनुमान करीब 66.3% है. यानी बाजार को उम्मीद है कि फेड जुलाई में दरें नहीं बढ़ाएगा, लेकिन सितंबर में क्या होगा, अभी कहा नहीं जा सकता है, ये पूरी तरह रिटेल महंगाई के आंकड़े और रोजगार डेटा पर निर्भर करेगा.
7 जुलाई को ADP रोजगार डेटा आएगा जबकि 9 जुलाई को साप्ताहिक बेरोजगारी दावों के आंकड़े जारी होंगे. CME FedWatch टूल के मुताबिक, सितंबर में दर बढ़ोतरी की संभावना करीब 50% है, जबकि पहले का अनुमान दो तिहाई था.

