IRDAI के नए प्रस्तावों से क्या पॉलिसीहोल्डर्स के लिए प्रीमियम कम होगा?

sureofficialmedia_admin
9 Min Read

भारत में बीमा इंडस्ट्री लगातार बढ़ रही है. लोगों की इनकम बढ़ी, इकोनॉमी का साइज बढ़ा और हेल्थ, लाइफ, मोटर जैसे इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स की डिमांड भी बढ़ी, लेकिन एक सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या बीमा की पहुंच उसी रफ्तार से बढ़ी, जिस रफ्तार से बीमा के प्रीमियम और इकोनॉमी बढ़ी है. इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDAI को शायद यही बात सबसे ज्यादा खटकी, इसलिए उसने अपने नए कंसल्टेश पेपर में इसी सवाल को सबसे ऊपर रखा है. IRDAI ने बीमा कंपनियों के एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट यानी EoM को धीरे-धीरे कम करने और कमीशन और डिस्ट्रीब्यूटर पेआउट पर ज्यादा कंट्रोल करने का प्रस्ताव दिया है.

IRDAI का तर्क बिल्कुल साफ है, अगर बीमा बेचने और चलाने की लागत कम होगी, तो इसका फायदा पॉलिसीहोल्डर्स को होगा, उसे कम कीमत पर बेहतर प्रोडक्ट वैल्यू मिलेगी. तो क्या ये समझा जाए कि अगर IRDAI के ये प्रस्ताव अगर लागू हुए तो पॉलिसीहोल्डर्स के लिए बीमा प्रीमियम कम हो जाएगा. इसका जवाब जानने से पहले समझिए कि पूरा मामला क्या है?

पूरा मामला क्या है

IRDAI ने बीमा वितरण व्यवस्था में सुधार के लिए खर्च और कमीशन को लेकर नए प्रस्ताव रखे हैं. इसमें बीमा कंपनियों के प्रबंधन खर्च यानी Expenses of Management (EoM) को धीरे-धीरे कम करने का प्रस्ताव है. मौजूदा व्यवस्था में जीवन बीमा कंपनियों के लिए EoM की सीमा 30% तक है. प्रस्ताव के मुताबिक इसे दो साल में 15% और पांच साल में 12.5% तक लाया जाएगा. जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के मामले में भी EoM को मौजूदा 30% से घटाकर दो साल में 25% और पांच साल में 20% तक लाने का प्रस्ताव है. इसका सीधा मतलब है कि बीमा कंपनियों को अपने कारोबार के मुकाबले खर्च को धीरे-धीरे कम करना होगा.

अब बीमा कंपनियों के खर्चों में कमी आती है तो, बीमा कंपनी चाहे तो अपनी कम हुई लागत का फायदा पॉलिसीहोल्डर्स को कम प्रीमियम के रूप में दे सकती है. नहीं तो वो इसका इस्तेमाल अपनी कंपनी के मुनाफे में जोड़ सकती है. इसलिए केवल कमीशन या खर्च कम करने से यह गारंटी नहीं होती कि ग्राहक का प्रीमियम भी उतनी ही मात्रा में कम हो जाएगा.

कमीशन पर ‘कैप’ का प्रस्ताव

बीमा बेचने में एजेंट्स, ब्रोकर और दूसरे डिस्ट्रीब्यूटर्स काफी बड़ा रोल निभारते हैं. इनको दिए जाने वाले कमीशन और दूसरे तमाम इनसेंटिव्स बीमा कंपनियों की लागत का हिस्सा होते हैं. पॉलिसीधारकों के लिए एक अहम प्रस्ताव लाइफ इंश्योरेंस में कमीशन की अधिकतम सीमा तय करने से जुड़ा है. रेगुलेटर ने व्यक्तिगत नॉन-लिंक्ड और लिंक्ड जीवन बीमा पॉलिसियों में प्रीमियम कितने साल तक जमा किया जाता है, उसके आधार पर पहले साल के कमीशन की सीमा तय करने का प्रस्ताव दिया है. इसका मकसद पॉलिसी बेचने की लागत को नियंत्रित करना है, जिससे लंबे समय में पॉलिसीधारकों को फायदा मिल सकता है

  • 5 साल से कम अवधि के प्रीमियम पर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के लिए कमीशन 5% प्रस्तावित है. जबकि एजेंट के लिए प्रस्तावित कमीशन 6.25% है.
  • 5 साल तक की अवधि के प्रीमियम पर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के लिए कमीशन 10% प्रस्तावित है. जबकि एजेंट के लिए प्रस्तावित कमीशन 12.5% है.
  • 6–8 साल अवधि के प्रीमियम पर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के लिए कमीशन 14% प्रस्तावित है. जबकि एजेंट के लिए प्रस्तावित कमीशन 17.5% है.
  • 9 साल की अवधि के प्रीमियम पर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के लिए कमीशन 18% प्रस्तावित है. जबकि एजेंट के लिए प्रस्तावित कमीशन 22.5% है.
  • 10 साल या ज्यादा के प्रीमियम पर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के लिए कमीशन 20% प्रस्तावित है. जबकि एजेंट के लिए प्रस्तावित कमीशन 25% है.

इस व्यवस्था का मकसद ये है कि बीमा बेचने की लागत पर एक नियंत्रण रहे और लंबे समय की पॉलिसियों में भी कमीशन का स्ट्रक्चर एकदम साफ-साफ हो. IRDAI के मौजूदा लाइफ इंश्ंयोरेंस प्रोडक्ट नियमों में भी प्रोडक्ट की कीमत तय करते समय कमीशन और दूसरे खर्चों को ध्यान में रखने की व्यवस्था है. यानी कमीशन इंश्योरेंस प्रोडक्ट की कीमत तय करने की कैलकुलेशन का हिस्सा है.

क्यों जरूरी है कमीशन में कटौती?

IRDAI को कमीशन को लेकर इस तरह का प्रस्ताव क्यों लाना पड़ा, अगर हम कुछ डेटा को देखेंगे तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाएगी. मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के मुताबिक – करीब 92% प्रीमियम कॉरपोरेट एजेंट्स के जरिए आता है. FY23 से FY25 के बीच नया बीमा बिजनेस यानी नया प्रीमियम 28% बढ़ा, लेकिन डिस्ट्रीब्यूटर्स को दिया गया कुल भुगतान 125% बढ़ गया. पहले साल के प्रीमियम का करीब 27% हिस्सा डिस्ट्रीब्यूटर्स के भुगतान में जा रहा था. इसके अलावा, बेस कमीशन के ऊपर मिलने वाले इनसेंटिव्स और रिवॉर्ड्स से ये लागत 30% से 60% तक और बढ़ सकती है.

जनरल इंश्योरेंस में FY23 से FY25 के बीच ब्रोकरों के जरिए मिला प्रीमियम 37% बढ़ा, लेकिन उन्हें दिया जाने वाला कमीशन 173% बढ़ गया. इस दौरान औसत ब्रोकर कमीशन 8.5% से बढ़कर 17% हो गया. यानी बीमा कारोबार बढ़ने की तुलना में डिस्ट्रीब्यूटर पर होने वाला खर्च कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा है.

IRDAI का कहना है कि बहुत ज्यादा कमीशन और बीमा बेचने की कई परतें ग्राहकों के लिए बीमा की लागत बढ़ा सकती हैं. इसका असर या तो ज्यादा प्रीमियम के रूप में दिखाई दे सकता है या फिर ग्राहक को दिए जाने वाले इंश्योरेंस प्रोडक्ट की कीमत में कमी के रूप में दिख सकता है

IIFL की एक रिपोर्ट कहती है कि कमीशन और ऑपरेशनल खर्च कम होने से बीमा कंपनियों के लिए कम कीमत पर बीमा देने की गुंजाइश बन सकती है, जिससे कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है. साथ ही, लागत कम होने से बीमा कंपनियों का मुनाफा भी बढ़ सकता है लेकिन अगर कमीशन बहुत ज्यादा कम कर दिया जाता है, तो एजेंट और दूसरे डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए बीमा बेचने का इनसेंटिव कम हो सकता है. इससे नए कारोबार और बीमा क्षेत्र में आने वाली नई पूंजी पर असर पड़ने की आशंका है.

क्या प्रीमियम कम होगा?

अब सबसे जरूरी सवाल, अगर बीमा बेचने और ऑपरेट करने की लागत कम होती है, तो क्या इसका फायदा सिर्फ बीमा कंपनियों के मुनाफे तक सीमित रहेगा या इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक भी पहुंचेगा? कम लागत से बीमा कंपनियों के पास प्रीमियम कम करने की गुंजाइश बन सकती है. बचत वाली लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों में लागत कम होने से पॉलिसीधारक के लिए मिलने वाले रिटर्न में सुधार की संभावना भी बन सकती है. साथ ही, बीमा कंपनियां कम लागत का इस्तेमाल बेहतर कस्टमर सर्विस और क्लेम्स के निपटारे की प्रक्रिया सुधारने में कर सकती हैं.

हालांकि, ये जरूरी नहीं है कि लागत में हर कमी का सीधा फायदा प्रीमियम कम होने या रिटर्न बढ़ने के रूप में ग्राहक को मिले. ये इस बात पर निर्भर करेगा कि बीमा कंपनियां लागत में हुई बचत का कितना हिस्सा ग्राहकों को देती हैं और कितना हिस्सा अपने मुनाफे या दूसरे खर्चों में इस्तेमाल करती हैं. इसलिए इस प्रस्ताव का असली फायदा तभी साफ होगा, जब नई व्यवस्था लागू होने के बाद यह देखा जाएगा कि बीमा की लागत कितनी घटी और उसका कितना फायदा सीधे पॉलिसीधारकों तक पहुंचा.

Share This Article