पिछले कुछ महीनों में जब पश्चिम एशिया में जंग छिड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से आने वाला तेल-गैस की सप्लाई थम सी गई तो, तो देश को एक बात साफ समझ आ गई कि रसोई गैस के मामले में भारत बाहर से आने वाले इंपोर्ट पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. इसी बात से सबक लेते हुए, अब पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला किया है. 13 अगस्त को जारी एक आदेश में मंत्रालय ने देश की 21 रिफाइनरियों और अपस्ट्रीम कंपनियों के लिए अलग-अलग LPG उत्पादन सीमाएं तय कर दी हैं.
ये पहली बार है जब हर कंपनी के लिए अलग से ये तय किया गया है कि ज़रूरत पड़ने पर उसे कितनी रसोई गैस का उत्पादन करना है. इस लिस्ट में प्राइवेट सेक्टर की Reliance Industries को सबसे बड़ा प्रोडक्शन टारगेट मिला है. यहां एक बात और साफ करना जरूरी है कि सरकार का मकसद सिर्फ ज्यादा LPG का उत्पादन करवाना नहीं है, बल्कि असली मकसद है कि अगर भविष्य में विदेशों से LPG की सप्लाई अचानक रुकती या घटती है, तो देश के पास घरेलू उत्पादन बढ़ाने का तैयार सिस्टम मौजूद रहे.
पहले क्या हुआ था?
फरवरी के आखिर में जब अमेरिका, इजराययल और ईरान की जंग शुरू हुई थी, तब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का समुद्री रास्ता एक तरह से बंद हो गया था, भारत की मुश्किलें बढ़ गईं थीं क्योंकि देश को सऊदी अरब जैसे देशों से मिलने वाले करीब 90% इंपोर्ट इसी रास्ते से आते हैं. भारत हर साल करीब 33.2 मिलियन टन LPG खपत करता है, यानी रोजाना करीब 91,000 टन. इसमें से सिर्फ 13.1 मिलियन टन यानी करीब 35,900 टन प्रतिदिन देश के भीतर ही बनता है, बाकी 21.3 मिलियन टन यानी हर दिन करीब 58,400 टन बाहर से मंगवाना पड़ता है. मतलब साफ है कि 64% से ज़्यादा हिस्सा इंपोर्ट पर ही टिका है, और जैसे ही सप्लाई लाइन पर संकट आया, पूरा सिस्टम हिलने लगा.
हालात को संभालने के लिए उस वक्त सरकार ने तुरंत कुछ आपातकालीन कदम उठाए थे. मार्च में रिफाइनरियों को कहा गया कि पेट्रोकेमिकल बनाने में इस्तेमाल होने वाली स्ट्रीम्स को मोड़कर LPG उत्पादन बढ़ाया जाए. शुरुआत में इंडस्ट्रियल और कमर्शियल ग्राहकों को सप्लाई रोक दी गई थी, जिसे बाद में धीरे-धीरे फिर से शुरू किया गया. घरेलू उपभोक्ताओं के लिए सिलेंडर बुकिंग का समय बढ़ा दिया गया और लोगों को PNG की ओर मोड़ने की कोशिश हुई, क्योंकि उस पर युद्ध का असर उतना नहीं पड़ा था. इन कदमों की बदौलत संकट के सबसे मुश्किल दौर में घरेलू उत्पादन बढ़कर करीब 55,000 टन प्रतिदिन तक पहुंच गया था, जो कि पहले करीब 35,900 टन प्रतिदिन था. जून के मध्य से जब हालात सामान्य होने लगे, तो ये आपातकालीन आदेश धीरे-धीरे वापस ले लिए गए.
अब क्या बदला है?
मगर सरकार समझ चुकी है कि ऐसी स्थिति दोबारा न आए, इसके लिए पुख्ता इंतज़ाम करने होंगे. इसलिए एक ऐसा सिस्टम या फ्रेमवर्क तैयार किया गया है ताकि भविष्य में अगर फिर कभी विदेशी सप्लाई में रुकावट आए, तो हर बार अलग से आपातकालीन आदेश जारी करने की नौबत न आए. इस बार का आदेश पुराने आपातकालीन आदेश को ही आगे लेकर जाता है, जो मुसीबत आने पर नहीं बल्कि उसके पहले ही कमर कसकर तैयार रहने की हिदायत करता है.
इसमें हर रिफाइनरीज और अपस्ट्रीम कंपनी के लिए न्यूनतम उत्पादन क्षमता तय कर दी गई है, साथ ही उन्हें LPG के स्टोरेज, निकासी और ट्रांसपोर्टेशन के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने को भी कहा गया है. कंपनियों से ये भी कहा गया है कि जहां भी तकनीकी और आर्थिक रूप से संभव हो, अपने प्लांट्स को अपग्रेड करें ताकि उत्पादन और बढ़ाया जा सके. इन 21 यूनिट्स की कुल उत्पादन क्षमता 63,810 टन प्रतिदिन आंकी गई है. ये आंकड़ा वित्त वर्ष 2025-26 में हुए घरेलू LPG उत्पादन से दोगुने से भी ज़्यादा है, और देश की रोज़ाना की कुल खपत के लगभग 70% के बराबर बैठता है. ध्यान रहे, ये सीमाएं हर वक्त लागू नहीं रहेंगी. इन्हें सिर्फ तभी लागू किया जाएगा जब सप्लाई में किसी तरह की चुनौती सामने पेश आएगी.
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किस कंपनी को कितना लक्ष्य
किस कंपनी को कितना LPG सिलेंडर का उत्पादन करना है, इस पूरी लिस्ट में सबसे बड़ा हिस्सा रिलायंस इंडस्ट्रीज के खाते में गया है. कंपनी की जामनगर की पुरानी रिफाइनरी, जो घरेलू बाज़ार के लिए उत्पादन करती है, उसको ज़रूरत पड़ने पर रोज़ाना 18,000 टन तक LPG बनाना होगा. हालांकि रिलायंस की दूसरी रिफाइनरी, जो सिर्फ एक्सपोर्ट के लिए काम करती है, उसके लिए कोई लक्ष्य तय नहीं किया गया है.
Russia-backed Nayara Energy की Vadinar refinery को भी उत्पादन क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य दिया गया है. करीब 20 मिलियन टन सालाना क्षमता वाली इस रिफाइनरी को 4,480 टन LPG प्रतिदिन तक उत्पादन का लक्ष्य दिया गया है. इससे पता चलता है कि सरकार LPG संकट से निपटने के लिए केवल सरकारी तेल कंपनियों पर निर्भर नहीं रहना चाहती है. निजी रिफाइनरियों को भी इस व्यवस्था में बड़ी भूमिका दी गई है.
देश की 18 सरकारी क्षेत्र की रिफाइनरियों को मिलाकर कुल 31,470 टन LPG प्रतिदिन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है. इसके अलावा ONGC और GAIL जैसी अपस्ट्रीम और गैस प्रोसेसिंग कंपनियों को भी इसमें शामिल किया गया है. इन कंपनियों को प्राकृतिक गैस से LPG बनाने के लिए कुल 6,460 टन प्रतिदिन का लक्ष्य दिया गया है. इस तरह सरकार ने LPG उत्पादन की पूरी चेन को एक साथ जोड़ने की कोशिश की है.
अब आगे क्या होगा?
एक और जरूरी बात, अगर सरकार को लगता है कि लोगों के लिए घरेलू LPG की पर्याप्त उपलब्धता, डिस्ट्रीब्यूशन और उचित दामों पर सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है, तो वो सीधे या हाई टेक्नोलॉजी सेंटर या किसी और ऑथराइज्ड एजेंसी के ज़रिए, रिफाइनिंग कंपनियों, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और अपस्ट्रीम कंपनियों को आदेश देकर तय समय और वॉल्यूम के लिए उत्पादन बढ़ाने को कह सकती है. जैसे ही ऐसा कोई आदेश जारी होगा, कंपनियों को तय समयसीमा के भीतर अपना उत्पादन बढ़ाना ही होगा.
साथ ही, ये प्रोडक्शन शेड्यूल हर 6 महीने में, यानी हर साल 1 जनवरी और 1 जुलाई को अपडेट किया जाएगा. इसका मतलब है कि जैसे-जैसे नई रिफाइनरीज या अपस्ट्रीम फील्ड्स शुरू होंगी, या मौजूदा यूनिट्स में तकनीकी और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े बदलाव होंगे, वैसे-वैसे इन लक्ष्यों में भी बदलाव किया जाता रहेगा. कंपनियों से यह भी कहा गया है कि वे नैफ्था को LPG में बदलने और फ्लुइड कैटेलिटिक क्रैकिंग यूनिट्स को अपग्रेड करने जैसे उपायों पर गंभीरता से विचार करें, ताकि मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर से ही ज़्यादा से ज़्यादा LPG निकाला जा सके.
कुल मिलाकर सरकार की कोशिश यही है कि अगली बार जब भी विदेशों से आने वाली सप्लाई में कोई अड़चन आए, तो देश को उस तरह की किल्लत का सामना न करना पड़े जैसा हाल के संकट में देखने को मिला था.
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