देश की तेल मार्केटिंग कंपनियों का पेट्रोल पर घाटा अब मुनाफे में तब्दील हो चुका है, डीज़ल पर घाटा भी करीब आधा हो चुका है, मगर पूरी भरपाई नहीं हो पाई है. देखने में तो ऐसा लग रहा है कि तेल मार्केटिंग कंपनियां IOC, BPCL, HPCL जो देश में फ्यूल सप्लाई की रीढ़ की हड्डी हैं, अब बेहतर स्थिति में आ रही हैं, इसलिए बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या ये सुधार उनके Q2FY27 के नतीजों में दिखेगा. मगर, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है, जिसे समझना जरूरी है.
तेल मार्केटिंग कंपनियों के लिए FY27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून बहुत खराब रही. Emkay Research की अक्टूबर की शुरुआत में जारी एक प्रिव्यू रिपोर्ट कहती है कि दूसरी तिमाही (Q2FY27) में एक रिबाउंड देखने को मिल सकता है.
पेट्रोल और डीज़ल का मार्जिन सुधरा
Emkay रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक कच्चे तेल की औसत कीमतों में आई गिरावट और रिटेल कीमतों में की गई बढ़ोतरी की वजह से Q2FY27 में पेट्रोल पर मार्केटिंग मार्जिन करीब +₹2.9 प्रति लीटर रहने का अनुमान है. इसमें विंडफॉल लेवी का असर शामिल नहीं है. Q1 में यही मार्जिन करीब ₹12 प्रति लीटर के घाटे में था. यहां ये समझना जरूरी है कि चार साल के लंबे इंतजार के बाद मई में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की गई थी. इसने तेल कंपनियों के इकट्ठा होते घाटे के बोझ को काफी हद तक कम किया. मगर, आगे भी ऐसा होगा कहना मुश्किल है.
पेट्रोल पर मार्जिन भले ही निगेटिव से पॉजिटिव हो गया हो, लेकिन डीज़ल के लिए ये अब भी निगेटिव है. हालांकि घाटा करीब ₹32 प्रति लीटर से घटकर करीब ₹16.7 प्रति लीटर रहने का अनुमान है. इसको आप चाहें तो पॉजिटिव ले सकते हैं, क्योंकि नुकसान आधा हो चुका है, मगर पूरी तरह खत्म करना जरूरी है.
LPG और ATF की अंडर रिकवरी सुधरी
पेट्रोल और डीज़ल के बाद LPG और ATF में भी तेल मार्केटिंग कंपनियों की अंडर रिकवरी भी सुधरी है. अंडर-रिकवरी का मतलब है कि इन प्रोडक्ट्स को लोगों तक पहुंचाने में कंपनी का जो खर्च आता है और ग्राहकों से जो पैसा मिलता है, उसके बीच का अंतर. LPG के लिए ये अंतर पहले करीब ₹510 प्रति सिलेंडर था, जो अब घटकर करीब ₹290 प्रति सिलेंडर रहने का अनुमान है.
महीने-दर-महीने यह अंतर कुछ ऐसा रहा है –
जुलाई: करीब ₹490
अगस्त: करीब ₹180
सितंबर: करीब ₹200
Emkay के मुताबिक इस अंडर रिकवरी में सुधार की तीन वजहें हैं. सऊदी कॉन्ट्रैक्ट कीमतों में पिछली तिमाही के मुकाबले करीब 19% की गिरावट आई, स्पॉट प्रीमियम में कमी आई और रिटेल कीमतों में जो बढ़ोतरी की गई. सरकार ने ATF की कीमतें जुलाई 2026 से लगातार बढ़ाई हैं. जिससे ATF का मार्जिन सुधरा है. हालांकि ये सुधार रुपये में कितना है ये नहीं बताया गया.
तेल कीमतें बढ़ेंगी तो भी कैसे फायदा होगा?
क्या कच्चा तेल महंगा होने पर सरकारी तेल कंपनियों को फायदा हो सकता है, उत्तर तो नहीं होना चाहिए, क्योंकि कच्चा तेल महंगा होने से उन कंपनियों की लागत बढ़ती है.
लेकिन Emkay Research की रिपोर्ट कहती है कि तब भी तेल कंपनियों को फायदा हो सकता है. इसकी वजह है इन्वेंट्री गेन यानी स्टॉक की कीमत बढ़ने से होने वाला रिपोर्टेड प्रॉफिट.
जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था. दूसरी तिमाही की शुरुआत में कच्चे तेल का भाव गिरकर करीब 68 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया था, सितंबर की शुरुआत तक ये बढ़कर लगभग 98 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया और तिमाही के आखिर में भाव करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. इसके बावजूद पूरी तिमाही में कच्चे तेल का औसत भाव करीब 97 डॉलर प्रति बैरल रहा, जो पिछली तिमाही के औसत से लगभग 6% कम था.
मतलब ये कि पूरी तिमाही का औसत भाव पिछली तिमाही से कम रहा, लेकिन आखिरी दिनों में कीमतों में तेज उछाल आया. इसी अंतर को समझना जरूरी है. देखिए – तेल रिफाइनरी कंपनियां कच्चा तेल खरीदने के तुरंत बाद उसे पेट्रोल-डीजल में नहीं बदल देतीं. खरीद, रिफाइनिंग और तैयार ईंधन की बिक्री के बीच कुछ समय का अंतर होता है. इस दौरान कच्चा तेल या तैयार ईंधन कंपनी के स्टॉक में मौजूद रहता है.
मान लीजिए, किसी कंपनी ने कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर खरीदा था. जब तिमाही के आखिर में बाजार भाव बढ़कर 120 डॉलर हो गया, तो कंपनी के पास मौजूद उस स्टॉक की मार्केट वैल्यू भी बढ़ गई. इस तरह कीमतों में बदलाव से कंपनी के खातों में इन्वेंट्री गेन दिख सकता है। हालांकि. इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनी ने ज्यादा पेट्रोल-डीजल बेचा या उसकी बिक्री पर मुनाफे का मार्जिन बढ़ गया.
यही इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू है कि स्टॉक की कीमत बढ़ने से तिमाही के घोषित नतीजे बेहतर दिख सकते हैं, जबकि पेट्रोल-डीजल की वास्तविक बिक्री से होने वाली कमाई में उतना सुधार नहीं हुआ हो.
क्या पेट्रोल डीज़ल की कीमतें बढ़ेंगी
अब कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर से 105-107 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रही हैं. ऐसे में ICRA की एक रिपोर्ट कहती है कि अगर वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही यानी अक्टूबर 2026 से मार्च 2027 के दौरान ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 105 से 115 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहता है और पेट्रोल-डीजल की रिटेल कीमतें नहीं बढ़ाई जाती हैं, तो तेल कंपनियों की कुल अंडर-रिकवरी करीब 64,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है.
अंडर-रिकवरी का मतलब है कि कंपनियों को ईंधन बेचने से मिलने वाली रकम उसकी लागत के मुकाबले कम पड़ रही है. ऐसे हालात में कंपनियों को इस अंतर का बोझ खुद उठाना पड़ता है, जब तक कि कीमतों में बदलाव या किसी दूसरी व्यवस्था से इसकी भरपाई न हो. अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है और रिटेल कीमतें स्थिर रहती हैं, तो खासकर डीजल की बिक्री पर कंपनियों का नुकसान और बढ़ सकता है.
तब कंपनियों के पास इस नुकसान की भरपाई के लिए पेट्रोल डीजल की कीमतें बढ़ाने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं होगा. हालांकि वो कीमतें अपनी मर्जी से नहीं बढ़ा सकती हैं. काफी कुछ सरकार की मंशा पर भी निर्भर करता है. तेल कंपनियों के बोझ को हल्का करने के लिए दूसरे रास्ते भी अपनाए जा सकते हैं. जैसा कि RBI ने IOC, BPCL और HPCL के लिए विशेष डॉलर सुविधा शुरू की, ताकि महंगे कच्चे तेल और रुपये पर दबाव के बीच उनकी विदेशी मुद्रा संबंधी जरूरतों को सहारा मिल सके. इससे पता चलता है कि कीमतें बढ़ाने के अलावा कंपनियों को वित्तीय सहारा देने का रास्ता भी अपनाया जा सकता है.

