टाटा संस लिस्ट होगी या नहीं, इसे लेकर टाटा ग्रुप के अंदर लंबे समय से खींचतान चल रही है. इस बीच रिजर्व बैंक ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे टाटा ग्रुप में उन लोगों को झटका लग सकता है, जो ये नहीं चाहते हैं कि टाटा संस लिस्ट हो. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने 24 जून, 2026 को अपर लेयर’ नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (NBFCs) के लिए कुछ नए दिशा-निर्देश जारी किए. क्या हैं ये नियम और टाटा संस की लिस्टिंग पर इसका क्या असर होगा, समझिए.
RBI क्यों लाया नया नियम?
अपर-लेयर NBFCs देश की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण वित्तीय कंपनियां होती हैं. इन नियमों के लागू होने के बाद जिन भी NBFCs के पास 1 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के एसेट्स हैं, उनके लिए शेयर बाज़ार में लिस्ट होना अब जरूरी कर दिया गया है. मतलब ये कि रिजर्व बैंक अब किसी भी NBFC को ‘अपर-लेयर’ कैटेगरी में डालने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये या इससे ज़्यादा की संपत्ति का पैमाना मानेगा. यानी अगर किसी कंपनी की कुल संपत्ति इस आंकड़े को पार करती है, तो वह सीधे इस बड़ी कैटेगरी में आ जाएगी.
RBI को ये नियम इसलिए लाना पड़ा क्योंकि पुराने फ्रेमवर्क में ऐसा कोई सीधा आंकड़ा तय नहीं था. पहले अपर-लेयर कंपनियों की पहचान करने के लिए एक पेचीदा ‘स्कोरिंग सिस्टम’ या पैरामीट्रिक स्कोरिंग का इस्तेमाल किया जाता था. इसमें कंपनी का आकार, दूसरी कंपनियों से उसका जुड़ाव और उसके कामकाज की जटिलता जैसी कई चीज़ों को नापकर एक स्कोर दिया जाता था, इसी आधार पर ये फैसला होता था कि वो अपर लेयर है या नहीं.
टाटा संस के लिए रास्ते बंद
RBI के इस नियम के बाद अब आती है असल मुद्दे की बात, जो कि जुड़ी है टाटा संस की लिस्टिंग से. रिजर्व बैंक का ये फैसला एक ऐसा कदम है जिसने देश के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के लिए एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बने रहने के सारे रास्ते लगभग पूरी तरह बंद कर दिए हैं. अब टाटा संस को बाज़ार में लिस्ट कराना हो होगा, क्योंकि इसका कुल एसेट 1 लाख करोड़ रुपये से कहीं ज्यादा है.
टाटा संस हमेशा ही शेयर बाज़ार में लिस्ट होने से बचने का रास्ते तलाशती रही है. इसने रिजर्व बैंक के पास अपना कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) लाइसेंस रद्द करने के लिए आवेदन भी किया था. रिजर्व बैंक ने साल 2022 में ही टाटा संस को ‘अपर-लेयर NBFC’ की लिस्ट में डाल दिया था, जिसके नियम के मुताबिक इसे 2025 तक शेयर बाज़ार में लिस्ट होना था, मगर किसी न किसी कारण से लिस्टिंग में देरी होती चली गई, लेकिन अब इस नए नियम के बाद कंपनी के लिए लिस्टिंग से बचना और मुश्किल हो गया है.
टाटा संस को पुराने नियमों के मुताबिक सितंबर 2025 की तक लिस्ट होना था. पिछले साल जनवरी 2025 में, जब रिजर्व बैंक ने शेयर बाज़ार में लिस्ट होने वाली ‘अपर-लेयर NBFCs’ की फाइनल लिस्ट जारी की थी, तब उसने बताया था कि उसने अपना NBFC लाइसेंस सरेंडर करने के लिए जो अर्ज़ी दी थी, उस पर अभी विचार किया जा रहा है. टाटा संस ने ऐसा इसलिए किया कि वो शेयर बाजार में लिस्ट होने से बच सके. टाटा संस की अर्जी को रिजर्व बैंक भी दबावकर बैठा रहा, अबतक उसका कोई जवाब नहीं दिया.
RBI ने नहीं माने इंडस्ट्री के सुझाव
हालांकि फाइनेंस इंडस्ट्री ने रिजर्व बैंक को सुझाव दिए थे कि 1 लाख करोड़ रुपये की इस लिमिट को बढ़ाकर 2.5 लाख करोड़ रुपये कर दिया जाए. लेकिन रिजर्व बैंक ने उनकी मांगों को मानने से इनकार कर दिया. साथ ही, रिजर्व बैंक ने ये भी साफ कर दिया कि इस ‘अपर-लेयर’ कैटेगरी में कौन-सी कंपनियां आएंगी, उनकी पहचान हर साल RBI करेगा. हालांकि FY26 में रिजर्व बैंक ने ऐसी अपर-लेयर NBFCs की कोई आधिकारिक लिस्ट जारी नहीं की थी.
टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर टाटा ग्रुप के अंदर की खटपट अब किसी से छिपी नहीं है. टाटा ट्रस्ट्स ने बकायदा एक प्रस्ताव पास करके यह साफ़ कर दिया है कि कंपनी को ‘अनलिस्टेड’ ही रहना चाहिए, यानी इसे शेयर बाज़ार में नहीं जाना चाहिए. इस प्रस्ताव के बावजूद, टाटा ट्रस्ट्स के दो वाइस चेयरमैन, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से बयान दे दिया कि कंपनी का शेयर बाज़ार में लिस्ट होना एक अच्छा कदम होगा. इन दोनों वाइस चेयरमैन के बयानों ने टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टियों के बीच आपसी मतभेद को उजागर कर दिया है. टाटा ट्रस्ट्स के नए चेयरमैन नोएल टाटा खुद इस लिस्टिंग के सख्त खिलाफ हैं और चाहते हैं कि कंपनी प्राइवेट ही रहे. लेकिन क्या अब उनके लिए ऐसा कर पाना संभव होगा. ये बड़ा सवाल है, जिसका जवाब टाटा ग्रुप को जल्द ही देना होगा.
