बैंकों का ₹22 हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज बकाया और सेटल होगा सिर्फ ₹6.5 करोड़ रुपये में. यानी 99.97% का हेयरकट! ये चमत्कार हुआ है Essel Group के चेयरमैन रहे डॉ. सुभाष चंद्रा के मामले में, जिन्हें NCLT ने अपनी पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया में बड़ी राहत दी है.
सुभाष चंद्रा का करीब पूरा कर्ज़ माफ!
NCLT ने सुभाष चंद्रा के उस रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत कर्जदाताओं को ₹22,006.57 करोड़ के दावों के बदले सिर्फ ₹6.5 करोड़ ही मिलेंगे, यानी करीब-करीब पूरा कर्ज माफ. मगर, कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि ₹22,000 करोड़ का दावा था और ₹6.5 करोड़ मिलेंगे, बल्कि NCLT के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि क्या कर्जदाताओं को इस प्लान को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि जितना बड़ा दावा उनका था, उसके मुकाबले तो उन्हें कुछ भी नहीं मिल रहा.
कहानी यहीं खत्म नहीं होती, इस मामले में NCLT की दो-सदस्यीय बेंच ने सितंबर 2025 में बंटा हुआ फैसला दिया था, जिससे मामला अटक गया. फिर फरवरी 2026 में NCLT चेयरमैन ने तीसरे सदस्य निलेश शर्मा को मैदान में उतारा, ताकि टाई तोड़ी जा सके और शर्मा का फैसला प्लान के पक्ष में गया, जिससे बहुमत बन गया और रास्ता साफ हो गया
प्लान को 80% से ज्यादा वोट मिले
दिलचस्प बात ये है कि ये प्लान नवंबर 2024 में ही क्रेडिटर्स की मीटिंग में 80.814% वोटिंग सपोर्ट से पास हो चुका था, जो IBC के तहत जरूरी 75% की सीमा से काफी ज्यादा है.
मगर कुछ बड़े क्रेडिटर्स थे, जो इस प्लान से नाखुश थे, वो नहीं चाहते थे कि रीपेमेंट प्लान मंजूर हो, इसमें LIC Housing, HDFC Bank, Axis Bank, Canara Bank, RBL Bank, Union Bank और कई दूसरे बैंक भी शामिल थे. लेकिन इनका वोट शेयर मिलाकर भी 20% से कम था. IBC के सेक्शन 115 के तहत अब ये प्लान सभी कर्जदाताओं पर बाध्यकारी होगा, चाहे उन्होंने वोट किया हो या नहीं.
वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल, NCLT ने खारिज किया
इस प्लान के खिलाफ जो क्रेडिटर्स थे, उन्होंने कई आरोप लगाए, कई दावे किए लेकिन NCLT ने उनके किसी आरोप को सही नहीं माना. जैसे क्रेडिटर्स ने इस पूरी वोटिंग प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए. उनका आरोप है कि प्लान के पक्ष में वोटिंग को चंद्रा से जुड़ी संस्थाओं ने प्रभावित किया, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इसे भी नकार दिया, ये कहते हुए कि विवादित संस्थाएं IBC की धारा 79(2)(g) के तहत “एसोसिएट” की परिभाषा में फिट नहीं बैठतीं, और इस परिभाषा को जबरन व्यापक बनाकर नहीं देखा जा सकता.
चंद्रा की नेटवर्थ पर सवाल!, NCLT ने खारिज किया
कर्जदाताओं ने सुभाष चंद्रा की संपत्ति को लेकर भी सवाल खड़े किए. आज की तारीख में सुभाष चंद्रा की नेटवर्थ सिर्फ 31.79 करोड़ रुपये है. मगर, 2017 में RBL बैंक के सर्टिफिकेट के मुताबिक उनकी नेटरवर्थ करीब ₹45,888 करोड़ आंकी गई थी. 2018 में केनरा बैंक के मुताबिक ₹40,562 करोड़ और आज? सिर्फ ₹31.79 करोड़! मतलब 10 साल से भी कम समय में हजारों करोड़ की संपत्ति अचानक कहां गायब हो गई, लेकिन ट्रिब्यूनल ने कहा कि सिर्फ इस भारी अंतर से ये साबित नहीं होता कि संपत्ति छुपाई गई या डायवर्ट की गई, और फोरेंसिक ऑडिट कराना कानूनन अनिवार्य शर्त नहीं है.
अब आगे क्या होगा?
NCLT ने प्लान को एक बदलाव के साथ मंजूरी दी है. अनिल कुमार और सुनील जैन के जरिए 1,260 लोगों की ओर से दाखिल दावों को फाइनल क्रेडिटर्स लिस्ट से बाहर रखा जाएगा. और रीपेमेंट की रकम बाकी पात्र क्रेडिटर्स में दोबारा बांटी जाएगी. इसके बाद मामला वापस दो सदस्यों वाली बेंच के पास जाएगा. जो मेजोरिटी ओपिनियन के आधार पर आदेश जारी करेगी.
कहानी कहां से शुरू हुई
यह मामला 2022 में शुरू हुआ था. Indiabulls Housing Finance ने Section 95 के तहत सुभाष चंद्रा के खिलाफ पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू करने की याचिका दी थी. क्योंकि वो पर्सनल गारंटर के तौर पर जुड़े थे. कुछ समय तक सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश की वजह से प्रक्रिया रुकी रही. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्टे हटाया और अप्रैल 2024 में NCLT ने सुभाष चंद्रा को पर्सनल इनसॉल्वेंसी रिजोल्यूशन प्रोसेस में शामिल कर लिया. अब, करीब दो साल बाद, इस पूरी कहानी का एक बड़ा पड़ाव आ गया है.
माल्या ने फैसले पर तंज कसा
सुभाष चंद्रा को मिली इस राहत पर भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने तंज कसा है. माल्या ने अपने X सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा कि अगर ये खबर सच है, तो उनके “दोस्त” सुभाष को बहुत-बहुत बधाई. इसके साथ ही उन्होंने अपने मामले की तरफ इशारा करते हुए एक तीखा सवाल भी उठा दिया. माल्या का कहना है कि बैंकों और सरकार ने खुद माना है कि उनसे ₹6,203 करोड़ के फैसले वाले कर्ज के बदले ₹14,100 करोड़ वसूल लिए गए हैं, यानी असल बकाया से भी दोगुने से ज्यादा. उन्होंने आगे लिखा कि उनके जैसे और भी कई कर्जदारों ने बेहद कम रकम में अपना मामला सेटल कर लिया है. यही है भारत का डेट रेजोल्यूशन जस्टिस, ऐसा मुझे लगता है. और कोई मीडिया सवाल नहीं.
