PART 1: बचपन में सीखी गई छोटी-छोटी आदतें अक्सर पूरी जिंदगी हमारे साथ चलती हैं. सुबह जल्दी उठना, रोज व्यायाम करना या खाने-पीने को लेकर सावधान रहना. अगर ये आदतें बचपन में जीवन का हिस्सा बन जाएं तो बड़े होने पर इन्हें निभाना आसान हो जाता है. यही बात पैसों पर भी लागू होती है. अगर बच्चों को छोटी उम्र से ही पैसे की कीमत, बचत, खर्च और जरूरत और चाहत के बीच का फर्क समझा दिया जाए, तो आगे चलकर बच्चे पैसों से जुड़े फैसले ज्यादा समझदारी से ले सकते हैं. यानी पैसों को लेकर समझ की शुरुआत शेयर बाजार से नहीं, बचपन की छोटी-छोटी आदतों से होती है.
अब अगला सवाल ये कि शुरुआत कहां से करें. ये टॉपिक तो इतना बड़ा है, तमाम तरह के विषय हैं. तो देखिए- बच्चों को अगर पैसे की मानसिकता समझानी है तो उन्हें बिल्कुल बेसिक से शुरू करना होगा. यहां पर 2 टॉपिक हैं. जहां से शुरुआत की जा सकती है.
TOPIC 1: बचत और निवेश क्या होता है?
सबसे पहले तो बच्चों को बचत (Savings) और निवेश (Investments) के बार में बताना चाहिए. ये Financial Literacy की पहली सीढ़ी समझ लीजिए. इससे उन्हें पता चलेगा की बचत और निवेश एक ही चीज नहीं है.
बचत क्या होता है?
हम जो काम करते हैं, तो हमें हर महीने एक सैलरी मिलती है. उस सैलरी से हम अपने खर्चों को पूरा करते हैं. खर्चों को पूरा करने के बाद जो पैसा बच जाता है, उसे हम बचत कहते हैं. ये बचा हुआ पैसा अगर बैंक में अकाउंट में रखा है तो समय के साथ इसें ज्यादा बढ़ोतरी नहीं होती, क्योंकि बैंक जो ब्याज देता है वो बहुत कम होता है. इसलिए भविष्य के बड़े खर्चे जैसे कि पढ़ाई, घर लेना, शादी करना. ये सब पूरे नहीं हो सकते.
अब बच्चे को ऐसे समझाएं कि मान लीजिए कि पापा अपने 12 साल के बेटे को हर महीने 1000 रुपये पॉकेट मनी देते हैं. उसमें से वो 500 रुपये खर्च कर देता है और बाकी बचे 500 रुपये वो अपने गुल्लक में रख देता है तो क्या गुल्लक में रखे पैसे अपने आप बढ़ने लगेंगे. बिल्कुल नहीं.ऐसे में हमें इन पैसों को गुल्लक से निकालकर कहीं पर निवेश करना होगा. ताकि पैसा समय के साथ तेज़ी से बढ़े.
निवेश क्या होता है?
निवेश का मतलब है कि अपने पैसों को किसी ऐसी जगह पर लगाना जो महंगाई से ज्यादा रिटर्न दे, ताकि आपका पैसा बढ़ता हुआ दिखे. उन जगहों को जहां हम निवेश करते हैं, वो कई तरह की होती है. जिन्हें असेट क्लास कहते हैं.
जैसे –
- घर, दुकान, जमीन खरीद सकते हैं – यानी रियल एस्टेट में निवेश
- म्यूचुअल फंड्स में निवेश कर सकते हैं – म्यूचुअल फंड में निवेश
- स्टॉक मार्केट में लगा सकते हैं – स्टॉक मार्केट में निवेश
- सोना या चांदी खरीद सकते हैं – गोल्ड, सिल्वर में निवेश
- बॉन्ड्स खरीद सकते हैं – बॉन्ड्स में निवेश
मान लीजिए 12 साल के बच्चे ने अपनी पॉकेट मनी में से हर महीने 500 रुपये बचाना शुरू किया. इन पैसों को अगर वो SIP के जरिए म्यूचुअल फंड में निवेश करता है तो 10 साल बाद 12 परसेंट के अनुमानित रिटर्न पर 1.12 लाख रुपये हो जाएंगे. अगर वो पैसा सिर्फ गुल्लक में जमा करके रखता तो सिर्फ 60,000 रुपये ही रहते. यानी निवेश करने पर उसे 52 हजार रुपये का रिटर्न मिला मतलब फायदा मिला. बच्चा चाहे तो इस पैसे से अपनी कोई भी जरूरत या शौक पूरे कर सकता है.
इससे उसे यह समझ आने लगेगा कि पैसा सिर्फ खर्च करने के लिए नहीं है, बल्कि उसका एक हिस्सा भविष्य के लिए बचाया और बढ़ाया भी जा सकता है. और यही आदत आगे चलकर काफी काम आ सकती है. जब बच्चा बड़ा होकर खुद कमाना शुरू करे, तो पूरी सैलरी खर्च करने के बजाय उसके मन में यह सवाल भी आए कि इसमें से कितना पैसा मुझे बचाना और निवेश करना चाहिए?
हालांकि, बच्चों को शुरुआत से ही एक बात समझाना जरूरी है कि निवेश में रिटर्न की गारंटी नहीं होती. म्यूचुअल फंड और बाजार से जुड़े दूसरे निवेशों में रिटर्न ऊपर-नीचे हो सकता है और कुछ समय के लिए निवेश की रकम घट भी सकती है. इसलिए निवेश के साथ रिस्क और रिटर्न दोनों को समझना Financial Literacy का हिस्सा है.
TOPIC 2: जरूरत और चाहत क्या होती है?
बच्चों की आदत होती है कि वो किसी भी चीज़ को पाने की ज़िद करते हैं. हम अक्सर उनकी ज़िद के आगे झुक जाते हैं और जो वो चाहते हैं उन्हें दिला देते हैं. इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन हर बार उन्हें वो चीजें दिला देना जिसकी जरूरत शायद उनको थी भी नहीं, बच्चों को गलत दिशा में ले जाता है. ऐसे में उन्हें जिंदगी का एक बेहद अहम सबक देने की जरूरत है, वो है जरूरत और चाहत में फर्क समझाना.
बच्चों को ये समझाना बहुत जरूरी है कि हमारे पास पैसे सीमित होते हैं, लेकिन हमारी इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं. इसलिए हर चीज जो हमें पसंद आती है, उसे खरीदना जरूरी नहीं है. कुछ चीजें हमारी जरूरत होती हैं और कुछ सिर्फ हमारी चाहत.
जरूरत क्या होती है?
जरूरत यानी ऐसी चीज जिसके बिना हमारा जरूरी काम रुक सकता है या हमें परेशानी हो सकती है. जैसे- स्कूल की किताबें, यूनिफॉर्म, जूते, स्टेशनरी, खाना या कोई जरूरी दवा. ये ऐसी चीजें हैं जिन पर पैसा खर्च करना जरूरी है.
चाहत क्या होती है?
चाहत यानी ऐसी चीज जिसे हम खरीदना तो चाहते हैं, लेकिन उसके बिना हमारा जरूरी काम नहीं रुकता. जैसे – नया खिलौना, महंगा वीडियो गेम, नया मोबाइल, बाहर खाना या कोई ऐसी चीज जो सिर्फ इसलिए खरीदनी है क्योंकि वो हमें पसंद आ गई
बच्चों को इस बात को ऐसे समझाएं
मान लीजिए पापा ने अपने 12 साल के बेटे को 1,000 रुपये दिए. बच्चा बाजार जाता है और उसे 700 रुपये का एक खिलौना पसंद आ जाता है. वो तुरंत उसे खरीदना चाहता है.
लेकिन उसी बच्चे को अगले दिन स्कूल के लिए 500 रुपये की किताबें भी खरीदनी हैं. अब बच्चे से पूछिए- इन दोनों में जरूरत क्या है और चाहत क्या है?
किताबें उसकी जरूरत हैं, जबकि खिलौना उसकी चाहत है. अगर उसने 700 रुपये खिलौने पर खर्च कर दिए तो अगले दिन किताबें खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं बचेंगे. ऐसे में उसे अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी.
यहीं से बच्चे को प्राथमिकता तय करना सिखाया जा सकता है. उसे समझाएं कि इसका मतलब ये नहीं है कि खिलौना या अपनी पसंद की चीज कभी खरीदनी ही नहीं है. बिल्कुल खरीदनी है, लेकिन पहले जरूरी चीजों के लिए पैसे अलग करने हैं और उसके बाद जो पैसा बचे, उसमें अपनी चाहत पूरी करनी है.
एक कॉन्सेप्ट होता है ‘Delayed Gratification’ मतलब आज की छोटी छोटी इच्छाओं को रोककर भविष्य में किसी बड़े लक्ष्य को हासिल करना. जैसे- बच्चा अगर 200, 400, 500 रुपये की छोटे-मोटे खिलौने, चॉकलेट पर बेवजह खर्च न करके, इन्हीं पैसों को कुछ महीनों तक जमा करे. मान लीजिए कुछ महीने में पैसे जोड़कर बच्चे ने 3,000 रुपये इकट्ठा कर लिए तो वो इन पैसों सो एक बढ़िया क्रिकेट किट या बढ़िया शानदार जूते खरीद सकता है, जो उसके काम आ सकते हैं. मतलब, बच्चों को खर्च करने से रोकने की बजाय, उन्हें ये सिखाएं कि किस पर खर्च करना है और किन चीजों पर हाथ को रोककर चलना है.
यानी पैसे की समझ सिर्फ ये नहीं है कि कितना पैसा कमाया और कितना बचाया. असली Financial Literacy ये भी है कि पैसा कहां खर्च करना है, कितना खर्च करना है और किस खर्च को थोड़ी देर के लिए टाला जा सकता है. यही आदत आगे चलकर बच्चे को बेहतर Money Management सिखाएगी.

