‘ट्रंप टैरिफ’ का खौफ एक बार फिर लौट आया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इम्पोर्टेड जेनेरिक दवाओं पर भारी भरकम टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया है. जिसका सीधा और सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि दवाओं के मामले में भारत अमेरिका का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है. ट्रंप चाहते हैं कि इन जेनेरिक दवाओं का उत्पादन अमेरिका में ही हो, इसलिए ये टैरिफ लगाया गया है.
1 अगस्त से 100% टैरिफ
अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘TRUTH SOCIAL’ पर ट्रंप ने ऐलान किया कि ये टैरिफ 1 अगस्त, 2026 से लागू हो जाएगा. अगले 2 साल तक सभी जेनेरिक दवाओं पर जीरो टैरिफ रहेगा, लेकिन तीसरे साल से टैरिफ को बढ़ाकर 100% कर दिया जाएगा, फिर उसके अगले साल ये 200 परसेंट हो जाएगा.
टैरिफ का स्ट्रक्चर
| अवधि | टैरिफ |
| 1 अगस्त 2026 – 31 जुलाई 2028 | 0% |
| 1 अगस्त 2028 – 31 जुलाई 2029 | 100% |
| 1 अगस्त 2029 के बाद | 200% |
टैरिफ के पीछे ट्रंप का मकसद
दरअसल, अमेरिका अपनी 90% से ज्यादा जेनेरिक दवाओं API याीन Active Pharmaceutical Ingredient के लिए इंपोर्ट पर निर्भर है, जिसे वे कम करना चाहता है. इसलिए ट्रंप प्रशासन चाहता है कि जेनेरिक दवाओं का उत्पादन अमेरिका में ही किया जाए. विदेशी कंपनियों को अगस्त 2028 तक का 2 साल का वक्त इसलिए दिया गया है ताकि वो अमेरिका के भीतर ही अपनी दवाओं की फैक्ट्रियां लगा सकें.
ट्रंप ने अपने ‘TRUTH SOCIAL’ पर लिखा है कि ये फैसला अमेरिका में जेनेरिक दवाओं के उत्पादन को वापस लाने के लिए किया गया है. ट्रंप कहते हैं कि जो कंपनियां दिए गए समय के अंदर अमेरिका में अपनी फैक्ट्रियां या प्लांट नहीं लगाएंगी उन पर जुर्माना लगाया जाएगा. ट्रंप इस पोस्ट में आगे लिखते हैं कि इस पॉलिसी का मकसद अमेरिकी जनता की सुरक्षा करना है. पेटेंट वाली, ब्रांडेड या इनोवेटिव दवाओं पर जो पॉलिसी चल रही है, जो कि बहुत कामयाब भी रही है, उस पर कोई असर नहीं होगा. वो वैसे ही चलती रहेगी. पूरे अमेरिका में दवाओं की नई फैक्ट्रियां इस स्तर पर बन रही हैं जैसा पहले कभी नहीं देखा गया.
टैरिफ, ट्रंप और दवाएं
जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ का नंबर करीब 1 साल बाद आया है. ब्रांडेड, पेटेंटेड दवाओं पर टैरिफ का ऐलान वो पिछले साल ही कर चुके थे.
| 2 अप्रैल, 2025 | अमेरिका में नेशनल सिक्योरिटी और सप्लाई चेन को ध्यान में रखते हुए फार्मास्यूटिकल्स पर सेक्शन 232 के तहत एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी हुआ |
| 26 सितंबर, 2025 | ब्रांडेड/पेटेंटेड दवाओं पर 100% टैरिफ का ऐलान. तब भारतीय उद्योग संगठनों, जैसे IPA और Pharmexcil ने कहा था कि ये सिर्फ महंगी ब्रांडेड दवाओं पर है और भारत से एक्सपोर्ट की जाने वाली सस्ती जेनेरिक दवाओं को इससे बाहर रखा गया है |
| 22 जुलाई, 2026 | अब ट्रंप सरकार ने जेनेरिक दवाओं पर भी चरणबद्ध तरीके से टैरिफ का ऐलान कर दिया है. यानी जो राहत और छूट अब तक जेनेरिक दवाओं को मिल रही थी, वो अब खत्म हो गई है. |
जेनेरिक दवाएं क्या होती है?
आगे बढ़ने से पहले जरा समझ लीजिए कि जेनेरिक दवाएं क्या होती हैं और ये ब्रांडेड दवाओं से कैसे अलग होती है. अक्सर जब किसी नई दवा की खोज होती है, तो खोज करने वाली कंपनी उस दवा को अपने लिए पेटेंट करवा लेती है और सिर्फ वही उसे बना और बेच सकती है. कोई दूसरी कंपनी उस दवा को न तो बना सकती है और न बेच सकती है. इसलिए ये ब्रांडेड दवाए महंगी होती हैं.
मगर, एक समय के बाद वो पेटेंट खत्म हो जाता है. तो बाकी कंपनियां भी उस दवा को बनाकर बेच सकती है. तब इसे जेनेरिक दवा कहा जाता है. यानी जेनेरिक दवा वो दवा होती है जो किसी ब्रांडेड दवा का पेटेंट खत्म होने के बाद उसी फॉर्मूले से बनाई जाती है. उसमें वही एक्टिव इंग्रीडिएंट्स, वही डोज़, वही असर और वही सुरक्षा मानक होते हैं जो ओरिजिनल ब्रांडेड दवा में होते हैं, बस नाम और कीमत अलग होती है.
भारत पर क्या असर होगा?
जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ लगाने का ये फैसला भारत के लिए इतना बड़ा झटका क्यों है? क्योंकि भारत अमेरिका को बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाएं सप्लाई करता है, इस मामले में अमेरिका का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है. अमेरिका के अलावा, भारत दुनिया के कई दूसरे देशों में भी दवाएं एक्सपोर्ट करता है, इसलिए भारत को “pharmacy of the world” कहा जाता है, यानी दुनिया के लिए दवा की दुकान.
भारत पर इसके असर को समझने के लिए आंकड़ों की गलियों से गुज़रना होगा. भारत कई बीमारियों के लिए जेनेरिक दवाएं बनाता है. जिसमें- मेंटल हेल्थ, डायबिटीज, हाइपर टेंशन, कैंसर की दवाएं तक शामिल हैं. GTRI यानी ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल 2025 में भारत ने अमेरिका को 9.7 बिलियन डॉलर की दवाओं का एक्सपोर्ट किया था, जो कि उसके ग्लोबल एक्सपोर्ट 25.8 बिलियन डॉलर का 38% है. ये पूरा एक्सपोर्ट करीब करीब पूरी तरह जेनेरिक दवाओं पर टिका है, इसलिए 200% तक का टैरिफ सीधे भारत के सबसे बड़े और सबसे मुनाफे वाले एक्सपोर्ट सेक्टर्स में से एक को निशाना बनाता है.
भारत क्यों है “दुनिया की फार्मेसी”
दुनिया की टॉप 20 जेनेरिक कंपनियों में से 8 भारत की हैं. India Brand Equity Foundation यानी IBEF के मुताबिक भारत में करीब 3,000 दवा कंपनियां और 10,500 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं. जो कि पूरी दुनिया की दवाओं की जरूरतों को पूरा करती हैं. भारत पूरी दुनिया के लिए क्या मायने रखता है, इसे क्यों दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है, ये समझाने के लिए कुछ तथ्य और आंकड़े नीचे दिए गए हैं.
| 1. | भारत दुनिया भर में अपनी सस्ती वैक्सीन और बढ़िया क्वालिटी की दवाओं लिए जाना जाता है. भारत पूरी दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर है. |
| 2. | दवाओं के उत्पादन के वॉल्यूम के मामले में भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है और कुल वैल्यू के मामले में 14वें पायदान पर है. |
| 3. | भारतीय फार्मा इंडस्ट्री पिछले 9 साल में 9.43% की सालाना दर से बढ़ी है और ये भारत की GDP में करीब 1.72% का योगदान देती है. |
| 4. | US FDA के स्टैंडर्ड पर खरी उतरने वाली सबसे ज्यादा फार्मा फैक्ट्रियां भारत के पास हैं. |
| 5. | भारत में 500 से ज्यादा API (दवा बनाने का कच्चा माल) मैन्युफैक्चरर्स हैं, जो ग्लोबल API मार्केट का करीब 8% हिस्सा रखते हैं. |
| 6. | UNICEF की कुल वैक्सीन डिमांड का 55% से 60% हिस्सा भारत से जाता है |
| 7. | WHO को DPT वैक्सीन की 99%, BCG की 52% और खसरे की 45% सप्लाई भारत ही करता है |
| 8. | AIDS का इलाज भारत की दवाओं पर टिका है. दुनिया भर में एड्स से लड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली 80% से अधिक एंटीरेट्रोवायरल दवाएं भारतीय कंपनियां ही सप्लाई करती हैं. |
भारत की फार्मा इंडस्ट्री की कमाई
Mordor Intelligence के मुताबिक भारत की फार्मा कंपनियों ने अपनी कमाई लगातार बढ़ाई है. साल 2025 में भारतीय फार्मा मार्केट का साइज 57.61 बिलियन डॉलर था, जो कि 5-6 साल में बढ़कर करीब 80 बिलियन डॉलर होने की उम्मीद है.
| 2025 में | भारतीय फार्मा का मार्केट 4,97,000 करोड़ रुपये (57.61 बिलियन डॉलर) |
| 2026 में | 5,20,000 करोड़ रुपये (60.32 बिलियन डॉलर) तक पहुंचने का अनुमान |
| 2031 तक | फार्मा इंडस्ट्री 5.74% की सालाना दर से बढ़ते हुए 6,89,000 करोड़ रुपये 79.74 बिलियन डॉलर) होगा |
भारत की दवा कंपनियों पर असर
भारत में ऐसी कई कंपनियां हैं, जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा अमेरिका को एक्सपोर्ट करके आता है. जिसमें डॉ रेड्डीज़,ल्यूपिन, सन फार्मा, अरबिंदो फार्मा और सिप्ला शामिल हैं. ये कंपनियां भारत की सबसे बड़ी जेनेरिक दवा निर्माता और अमेरिका को एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियां हैं. इन कंपनियों में से कई की 30-50% कमाई सीधे अमेरिका से आती है. इसलिए इन पर इस नए टैरिफ ऐलान का असर पड़ना तय है. ये सभी लिस्टेड कंपनियां हैं, आज 22 जुलाई को इनके शेयरों में हम बड़ी गिरावट देख रहे हैं.
अमेरिका पर कैसे होगा असर?
टैरिफ का असर सिर्फ भारत की दवा कंपनियों तक सीमित नहीं है, इसका असर अमेरिका की जनता पर भी देखने को मिल सकता है, क्योंकि जेनेरिक दवाएं अमेरिका में डिस्पेंस होने वाले करीब 90% प्रिस्क्रिप्शन का हिस्सा है. कुछ दवाओं की सप्लाई चेन पर भारत की करीब करीब मोनोपॉली है, जैसे कि अमेरिका में बिकने वाली बर्थ कंट्रोल पिल्स की करीब 65% सप्लाई सिर्फ दो भारतीय कंपनियां ही करती हैं, ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स और ल्यूपिन.
टैरिफ बढ़ा तो ये दवाएं अमेरिका के लिए महंगी हो जाएंगी, इनकी सप्लाई पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि कंपनियां महंगे टैरिफ से बचने के लिए दूसरे बाज़ारों की ओर रुख करेंगी. जिससे साफ है कि टैरिफ का असर सिर्फ भारतीय कंपनियों तक नहीं, बल्कि अमेरिकी मरीज़ों तक भी पहुंचेगा.

