Donald Trump New Tariff: 24 जुलाई, 2026 यानी आज से अमेरिका ने भारत समेत दुनिया के 60 देशों पर एक नया टैरिफ थोप दिया. इस बार बहाना पुराना “रेसिप्रोकल टैरिफ” वाला नहीं, बल्कि ‘जबरन मजदूरी’ का है. अमेरिका का कहना है कि इन देशों से आने वाले कुछ सामान बनाने में मजदूरों से जबरदस्ती काम कराया जाता है, इसलिए अब उन पर एक्स्ट्रा टैक्स लगेगा.
ये नया टैरिफ शुक्रवार की रात 12.01 बजे से लागू हो गया, ठीक ऐसे वक्त पर जब पिछला 10% का टेम्पररी टैरिफ खत्म होने वाला था. यानी जैसे ही पुराना 10% टैरिफ खत्म हुआ, उसके ठीक पहले ही Forced Labour या ‘बंधुआ मज़दूरी’ की आड़ में नया टैरिफ थोप दिया गया. 60 देशों पर ये नया टैरिफ लगाया गया है, इसमें 17 देश ऐसे हैं जिन पर 10% टैरिफ लगाया गया है, जिसमें की भारत शामिल है. जबकि 43 देशों पर 12.5% टैक्स लगाया गया है. अब दो तरह के टैरिफ क्यों हैं, इसकी वजह भी दिलचस्प है.
पहले ‘Forced Labour’ का मतलब समझिए
‘Forced Labour’ का मतलब है कि जब किसी इंसान से उसकी मर्जी के बिना, डरा-धमकाकर, किसी पुराने कर्ज के बदले, या बहुत ही कम या फिर बिना पैसों के जबरदस्ती काम कराया जाता है, तो उसे बंधुआ मजदूरी या जबरन मजदूरी कहते हैं.
अमेरिका का आरोप है कि भारत, चीन और बांग्लादेश जैसे देशों में फैक्ट्रियों और खेतों में मजदूरों से जबरन काम कराया जाता है और सस्ते में सामान बनाया जाता है. फिर उस सामान को अमेरिका में बहुत कम दाम पर बेचा जाता है. अमेरिका का कहना है कि इससे उसकी अपनी फैक्ट्रियों को नुकसान हो रहा है, क्योंकि उनका सामान इन देशों से आए सामानों के मुकाबले महंगा होता है.
बंधुआ मजदूरी, तस्करी करके मजदूरों से काम कराना और बाल श्रम ये सबकुछ इस कैटेगरी में आते हैं. अमेरिका ने पिछले कुछ समय में करीब 60 देशों में इसको लेकर जांच शुरू की थी, उसके बाद अब जाकर नया टैरिफ लगा दिया.
भारत पर 10% टैरिफ क्यों?
जून में जब USTR ने 60 देशों की जांच शुरू की थी, तब भारत को 12.5% वाली कैटेगरी में रखा गया था. लेकिन 14 जुलाई को भारत सरकार ने अपनी विदेश व्यापार नीति में तुरंत बदलाव कर दिया. भारत ने लिख दिया कि ‘भारत में भी बंधुआ मजदूरी से बना कोई सामान नहीं आएगा’. भारत के इस कदम को देखकर अमेरिका ने भारत का टैक्स 12.5% से घटाकर 10% कर दिया. यानी भारत को 2.5% की राहत मिल गई.
चीन, यूनाइटेड किंगडम और जापान जैसे 43 देशों पर12.5% का टैरिफ लगाया गया है. क्योंकि इन देशों में बंधुआ मजदूरी से बने सामान को रोकने के लिए सख्त कानून नहीं हैं. लेकिन भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, कनाडा जैसे देशों पर 10% टैरिफ इसीलिए लगा क्योंकि इन देशों ने बंधुआ मजदूरी रोकने के लिए अपने कानूनों और नीतियों में जरूरी सुधार किए या सुधार करने का वादा किया.
| कैटेगरी | टैरिफ | किन देशों पर लागू |
|---|---|---|
| 1. जिन्होंने जबरन मजदूरी रोकने का कानून/समझौता लागू किया | 10% | अर्जेंटीना, बांग्लादेश, कंबोडिया, कनाडा, इक्वाडोर, अल साल्वाडोर, ग्वाटेमाला, होंडुरास, भारत, इंडोनेशिया, जॉर्डन, मलेशिया, मेक्सिको, पाकिस्तान, श्रीलंका, त्रिनिदाद और टोबैगो, यूनाइटेड किंगडम. |
| 2. कुछ चुनिंदा अर्थव्यवस्थाएं | 10% या 12.5% (MFN रेट काटकर) | यूरोपियन यूनियन, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड. इनके कुछ खास प्रोडक्ट्स पर, जब तक अलग से छूट न मिली हो |
| 3. बाकी सभी जांच किए गए देश | 12.5% | वे सभी देश जो ऊपर की दो कैटेगरी में नहीं आते (जैसे चीन) |
Source: USTR Website
सुप्रीम कोर्ट को गच्चा देने की कोशिश!
डॉनल्ड ट्रंप ने बंधुआ मजदूरी के नाम पर आज जो नया टैरिफ थोपा है, इसकी स्क्रिप्ट पिछले साल ही लिख दी गई थी. अप्रैल 2025 में ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही भारत पर 25% का टैरिफ लगा दिया था. ये मामला अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, फरवरी 2026 में कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को तगड़ा झटका दिया. कोर्ट ने ट्रंप के “लिबरेशन डे टैरिफ” को गैर-कानूनी करार दे दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में तब कहा था कि राष्ट्रपति ने आपातकालीन शक्तियों का सहारा लेकर जिस तरह मनमाने ढंग से टैरिफ लगाए, वह कानूनन गलत हैं.
लेकिन ट्रंप प्रशासन इतनी आसानी से पीछे हटने वाला नहीं था. कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद, 24 फरवरी से, सभी देशों पर 150 दिन के लिए एक अस्थायी 10% टैरिफ लाद दिया गया, शायद इसलिए कि नए टैरिफ का कोई रास्ता खोजने का वक्त मिल जाए. ये 150 दिन की डेडलाइन शुक्रवार को खत्म होने वाली थी, इससे ठीक पहले ही ट्रंप ने बंधुआ मजदूरी के नाम पर नया टैरिफ 60 देशों पर लगा दिया. इस बार इसका आधार बदल दिया गया, आपातकालीन शक्तियों की बजाय ट्रेड एक्ट का सेक्शन 301 इस्तेमाल किया गया, जो कानूनी रूप से कहीं ज्यादा मजबूत माना जाता है और जिसे कोर्ट में चुनौती देना उतना आसान नहीं. सीधा सीधा ये समझें कि कोर्ट ने एक दरवाज़ा बंद किया, तो ट्रंप प्रशासन तुरंत दूसरे दरवाज़े से अंदर आ गया.
क्रोनोलॉजी समझिए
| अप्रैल 2025 | ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही भारत पर 25% का भारी टैक्स लगाया |
| फरवरी 2026 | अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के फैसले को गैर-कानूनी बताकर रद्द किया |
| 24 फरवरी 2026 | ट्रंप ने 150 दिन के लिए 10% का टैरिफ लगाया |
| 24 जुलाई 2026 | ‘बंधुआ मज़दूरी’ के नाम पर नया 10% का टैरिफ लगा दिया |
भारत के लिए इसका क्या मतलब?
अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रे़ड पार्टनर है और भारतीय एक्सपोर्ट के लिए सबसे बड़ा बाजार भी. 2025 में दोनों देशों के बीच ट्रेड करीब 141 बिलियन डॉलर तक पहुंचा, जिसमें अकेले भारत का एक्सपोर्ट 87.3 बिलियन डॉलर का था. ऐसे में हर टैरिफ बदलाव सीधे भारतीय एक्सपोर्टर्स की जेब पर असर डालेगा. भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले कपड़े, गहने, जूते-चप्पल, चमड़े का सामान और सी-फूड पर 10% टैक्स लगेगा. इससे अमेरिकी बाजार में ये भारतीय सामान थोड़े महंगे हो जाएंगे, जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए कंपटीशन बढ़ जाएगा.
भारत सरकार ने अमेरिका की दोनों जांचों पर आपत्ति जताई है और अपना रुख साफ कर दिया है कि इन मुद्दों पर बातचीत उस बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत होनी चाहिए, जिस पर दोनों देश पहले से बातचीत कर रहे हैं, अलग से टैरिफ थोपकर नहीं.
‘द वाशिंगटन पोस्ट’ की एक रिपोर्ट कहती है कि भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होने वाली हैं. ट्रंप प्रशासन अगले कुछ ही हफ्तों में टैरिफ का एक और नया पैकेज लाने जा रहा है. ये नया टैरिफ उन देशों पर लगाया जाएगा, जो अपनी इंडस्ट्रीज को सरकारी सब्सिडी देकर जरूरत से ज्यादा उत्पादन करते हैं और फिर दुनिया भर के बाजारों में सस्ता सामान एक्सपोर्ट कर देते हैं.
ट्रंप की जिद की वजह क्या है?
ऐसा लगता है कि ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टैरिफ को अपनी नाक का सवाल बना लिया है. इसकी कुछ वजहें समझ आती हैं.
ट्रंप अमेरिका फर्स्ट के नारे के साथ सत्ता में आए. अपनी इस छवि को बचाए रखने के लिए वो घरेलू उद्योगों को सुरक्षित करना चाहते हैं. ट्रंप का हमेशा से ये तर्क रहा है कि सस्ता विदेशी माल अमेरिकी फैक्ट्रियों और मजदूरों का रोजगार छीन रहा है, इसलिए इंपोर्ट महंगा करके घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी है. ये बातें वो राष्ट्रपति बनने से पहले कहते आए हैं.
दूसरी वजह, ट्रंप बंधुआ मजदूरी जैसे मुद्दे उठाकर, उसके नाम पर टैरिफ लगाकर ये दिखाने की कोशिश करते हैं कि ये सिर्फ ट्रेड वॉर नहीं है, बल्कि मानवाधिकारों की लड़ाई भी है. इससे टैरिफ को सार्वजनिक और कानूनी, दोनों तरह की स्वीकार्यता मिल जाती है.
तीसरी और शायद सबसे अहम वजह, कानूनी झटके से सीखा हुआ सबक. आपातकालीन शक्तियों वाला रास्ता कोर्ट में टिक नहीं पाया, तो अब प्रशासन जानबूझकर ट्रेड एक्ट जैसे पुराने, आजमाए हुए कानूनों का सहारा ले रहा है, जिन पर कोर्ट में सवाल उठाना कहीं मुश्किल होता है.
