सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फिर चर्चा में AT-1 बॉन्ड्स? डूब सकता है पूरा पैसा, फिर लोग क्यों करते हैं निवेश?

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जनवरी, 2023 में AT-1 बॉन्ड्स चर्चा में आए थे, क्योंकि तब बॉम्बे हाई कोर्ट का एक फैसला यस बैंक से जुड़े एक मामले में आया था. AT-1 बॉन्ड्स यानी एडिशनल टियर-1 बॉन्ड्स एक बार फिर से चर्चा में हैं, क्योंकि इस मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आया है. तो चलिए एक बार फिर से समझते हैं कि AT-1 बॉन्ड्स आखिर होते क्या हैं और इसे लेकर इतना विवाद क्यों है.

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड को राइट ऑफ यानी पूरी तरह रद्द करने के फैसले को गलत ठहराने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक, रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार की अपीलों का खारिज कर दिया है. जिसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी. इस फैसले से उन निवेशकों को राहत मिली है, जिनका पैसा मार्च 2020 में इन बॉन्ड को राइट ऑफ किए जाने के बाद डूब गया था.

पहले मामला समझिए

कहानी शुरू होती है मार्च, 2020 से जब यस बैंक को खराब होती वित्तीय हालत से बाहर निकालने के लिए रिजर्व बैंक ने उसकी रीस्ट्रक्चरिंग की योजना बनाई थी. रिजर्व बैंक ने बैंक का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया था और ग्राहकों के पैसे निकालने पर रोक लगा दी. बैंक को बचाने के लिए SBI की अगुवाई में कई बैंकों का एक कंसोर्शियम बनाया गया, जिसने बैंक में नई पूंजी डाली.

उस समय बैंक के लिए नियुक्त एडमिनिस्ट्रेटर ने 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड को पूरी तरह राइट ऑफ कर दिया था. इसमें 2016 में जारी किए गए 3,000 करोड़ रुपये और 2017 में जारी किए गए 5,415 करोड़ के बॉन्ड भी शामिल थे. इसका मतलब था कि इन बॉन्ड में पैसा लगाने वाले निवेशकों के पूरे पैसे डूब गए और उन्हें अपने निवेश का दावा करने का अधिकार तक नहीं रहा.

इसके खिलाफ बॉन्डहोल्डर्स और एक्सिस ट्रस्टी सर्विसेज ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. जनवरी 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि बैंक की रीस्ट्रक्चरिंग की अंतिम योजना में इन बॉन्ड्स को खत्म करने का प्रावधान नहीं था. इसलिए AT-1 बॉन्ड राइट ऑफ को रद्द कर दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी रुख को सही ठहराते हुए बैंक और रेगुलेटर्स की अर्जियों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ रेगुलेटर्स और यस बैंक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सही मानते हुए इसे बरकरार रखा है.

दोनों अदालतों ने क्यों माना अवैध

भले ही नियमों के मुताबिक AT-1 बॉन्ड्स को बैंकों के वित्तीय संकट के समय नुकसान की भरपाई के लिए पूरी तरह जीरो (राइट-ऑफ) किया जा सकता है, फिर भी साल 2020 में यस बैंक की ओर से किए गए राइट-ऑफ को लेकर एक बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया. बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही इस कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए खारिज कर दिया.

इस पूरे विवाद की मुख्य वजह यह नहीं थी कि AT-1 बॉन्ड्स को कानूनी तौर पर राइट-ऑफ किया जा सकता है या नहीं, बल्कि असली विवाद इस बात पर था कि क्या यस बैंक के मामले में ये फैसला सही अथॉरिटी और कानून की सही प्रक्रिया के तहत लिया गया था या नहीं. कोर्ट ने पाया कि जिस तरीके से और जिस अथॉरिटी की ओर से ये कदम उठाया गया, वो कानूनी प्रावधानों और तय नियमों के दायरे में नहीं था.

AT-1 बॉन्ड्स क्या होते हैं?

तो पूरी कहानी समझने के बाद अब चलिए समझते हैं कि AT-1 बॉन्ड्स आखिर होते क्या हैं, इससे निवेशकों को क्या फायदा मिलता है, ये क्यों जारी किए जाते हैं और यस बैंक को क्यों इसे राइट ऑफ करना पड़ा.

AT-1 का पूरा नाम Additional Tier-1 है. ये बैंकों की ओर से पैसा जुटाने का एक तरीका है. जब किसी बैंक को अपना कारोबार बढ़ाने के लिए या बेस कैपिटल मजबूत करना होता है तो वो निवेशकों को ये बॉन्ड जारी कर सकता है. ये बैंक की पूंजी का हिस्सा होते हैं और इन्हें आम बॉन्ड या फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की तरह सुरक्षित निवेश नहीं माना जाता. क्योंकि, इनकी कोई तय मैच्योरिटी डेट नहीं होती, यानी बैंक किसी तय तारीख पर पैसे लौटाने के लिए बाध्य नहीं होता है. इसलिए इन्हें आम भाषा में ‘परपेचुअल बॉन्ड’ (Perpetual Bonds) भी कहा जाता है. क्योंकि बैंक संकट में आने पर इनके पैसे को पूरी तरह राइट ऑफ कर सकते हैं. यानी निवेशकों का पूरा मूलधन डूब सकता है, क्योंकि बैंक इन्हें लौटाने के लिए बाध्य नहीं होता.

अब सवाल ये है कि इतना जोखिम होने के बावजूद निवेशक इसमें पैसा लगाते क्यों हैं? इसकी वजह है इन पर मिलने वाला ऊंचा रिटर्न, जो कि बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट, सरकारी बॉन्ड या कॉरपोरेट बॉन्ड के मुकाबले ज्यादा होता हैं. इसलिए जिन निवेशकों रेगुलर हाई रिटर्न चाहिए होता है, वो इसमें निवेश करना पसंद करते हैं. इन बॉन्ड्स में बैंक के डूबने या संकट में आने पर पैसा पूरी तरह जीरो होने का खतरा हमेशा बना रहता है, बैंक कभी भी इन बॉन्ड्स को राइट ऑफ या रद्द कर सकते हैं. इसलिए बैंक निवेशकों को इस अतिरिक्त जोखिम की भरपाई करने के लिए काफी आकर्षक और ऊंची ब्याज दरें ऑफर करते हैं, यही वजह है कि निवेशक इसमें पैसा लगाते हैं. निवेशक को इन बॉन्ड्स पर छमाही या सालाना रिटर्न मिलता है.

मगर, ज्यादातर AT-1 बॉन्ड में कॉल ऑप्शन होता है. इसके तहत बैंक को आम तौर पर बॉन्ड जारी होने के 5 या 10 साल बाद इन्हें वापस खरीदने का विकल्प मिलता है. अगर बैंक इस विकल्प का इस्तेमाल करता है और जरूरी रेगुलेटरी मंजूरियां मिल जाती हैं, तो निवेशकों को उनकी मूल रकम वापस मिल सकती है. लेकिन ये समझना जरूरी है कि कॉल ऑप्शन का मतलब ये नहीं है कि बैंक को उस तारीख पर बॉन्ड चुकाना ही होगा. बैंक इन्हें वापस न खरीदने का फैसला भी कर सकता है.

उदाहरण के लिए अगर कोई निवेशक 1 लाख रुपये के AT-1 बॉन्ड खरीदता है जिस पर 9% का सालाना ब्याज तय हुआ है, तो उसे हर साल ब्याज के रूप में 9,000 रुपये की कमाई होती रहेगी. ये सिलसिला तब तक चलता है जब तक बैंक बॉन्ड को वापस नहीं खरीद लेता (Call Option) या कोई वित्तीय संकट पैदा नहीं होता. अगर बैंक ने इसे रद्द कर दिया तो निवेशक के 1 लाख रुपये डूब जाएंगे.

तो ये है AT-1 बॉन्ड्स और उसकी पूरी कहानी. इसलिए अगर आप भी इसमें निवेश करने का विचार कर रहे हैं तो इसके जोखिमों का ध्यान जरूर रखें.

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