बीते कुछ सालों में देश में पेमेंट करने का तरीका बिल्कुल बदल चुका है, चुटकियों में पैसा इधर से उधर ट्रांसफर. चाय की टपरी से लेकर हवाई जहाज की टिकट तक, हर जगह एक ही आवाज आती है- “UPI कर दो”. हम सबको इसकी आदत हो गई है.
अभी तक UPI ट्रांजैक्शन पर कोई फीस नहीं लगती है, खासतौर पर छोटे दुकानदारों और ग्राहकों के लिए ये सिस्टम बिल्कुल फ्री है. लेकिन जैसै-जैसे UPI का इस्तेमाल बढ़ रहा है. वैसे-वैसे इसको चलाने, साइबर सिक्योरिटी और नेटवर्क की मजबूती की लागत भी बढ़ती जा रही है. इसलिए इस लागत की चुनौती से निपटने के लिए वित्त मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज ने संसदीय समिति को बताया है कि UPI के खर्चे को संभालने के लिए सरकार 2 मॉडल पर विचार कर रही है
क्या हैं वो 2 मॉडल
UPI पर हर महीने 150 अरब ट्रांजेक्शन होने का अनुमान है और आने वाले सालों में 60 करोड़ नए यूजर्स जुड़ने वाले हैं, यानी खर्चा और बढ़ेगा घटेगा नहीं. इसीलिए वित्त मंत्रालय ने 17 जुलाई को पैनल को दिए अपने जवाब में कहा है कि दो विकल्पों पर विचार चल रहा है. वित्त मंत्रालय ने यह जानकारी संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति को दी है. समिति की रिपोर्ट में सरकार ने खुद माना है कि UPI के मौजूदा मॉडल को बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चलाया जा सकता है. इसलिए UPI इकोसिस्टम को टिकाऊ बनाए रखने और सरकारी खजाने पर पड़ रहे दबाव को देखते हुए सरकार जिन दो मॉडल्स को लाने के बारे में सोच रही है. वो इस तरह से हैं
पहला: बड़े ट्रांजैक्शन, कारोबारियों पर फिर से MDR
MDR यानी Merchant Discount Rate वो चार्ज है, जो डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने वाले मर्चेंट से लिया जाता है. ये चार्ज पेमेंट सिस्टम में शामिल अलग-अलग संस्थाओं के बीच बांटा जाता है. भारत में 2019 तक UPI के कुछ मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर अधिकतम 0.30% तक MDR लागू था, मगर जनवरी 2020 में सरकार ने UPI पर जीरो-MDR सिस्टम को लागू कर दिया क्योंकि सरकार डिजिटल पेमेंट का बढ़ावा देना चाहती थी.
अब सरकार जीरो-MDR सिस्टम को खत्म करना चाहती है, लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि कि हर UPI पेमेंट पर शुल्क लगाया जाएगा. बल्कि प्रस्ताव यह है कि केवल कुछ बड़े ट्रांजैक्शन या तय सीमा से ऊपर के कारोबारियों पर मामूली MDR लगाया जा सकता है.
यानी अगर कोई व्यक्ति दुकान पर 200 या 500 रुपये का UPI पेमेंट करता है, तो उस पर MDR लगाने की बात नहीं हो रही है, बल्कि कुछ बड़े ट्रांजैक्शन पर लग सकता है, हालांकि ये कितना हो सकता है, इस बारे में समिति की रिपोर्ट में कोई सीमा नहीं दी गई है.
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दूसरा: सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करना
अभी UPI के जीरो-MDR मॉडल की बड़ी लागत का बोझ इंडस्ट्री ही उठाती है. उसकी भरपाई के लिए सरकार इंसेंटिव देती है, लेकिन संसद की स्थायी समिति ने इसे नाकाफी बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक UPI सिस्टम को चलाने पर सालाना खर्च करीब 20,700 करोड़ रुपये है, मगर जो सरकार की तरफ से मदद मिलती है वो सिर्फ 2,000 करोड़ रुपये है. यानी एक बड़ा बोझ इंडस्ट्री ही उठा रही है.
मतलब खर्चे का सिर्फ 11% ही सरकार दे रही है, बाकी 89% का बोझ बैंक और PhonePe, Google Pay, Paytm जैसी कंपनियां उठा रही हैं. मतलब सरकार पूरी लागत का एक छोटा सा हिस्सा ही दे रही है. समिति ने साफ कहा है – ‘अगर पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को उनकी लागत का पैसा नहीं मिलेगा, तो वो साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड रोकने और नेटवर्क को बेहतर बनाने में निवेश कैसे करेंगे? इससे पूरे सिस्टम को खतरा हो सकता है’
सरकार चाहती है कि एक अलग-अलग स्तर वाली इंसेंटिव व्यवस्था बनाई जाए. सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक मदद को अगले कुछ सालों में धीरे-धीरे कम करते हुए खत्म किया जाए. यानी सीधी भाषा में कहें तो सरकार अब यह सोच रही है कि या तो कुछ बड़े ट्रांजैक्शन पर मामूली फीस वसूली जाए, या फिर सालों-साल दी जा रही सब्सिडी को धीरे-धीरे बंद किया जाए.
UPI का खर्च इतना बढ़ क्यों रहा है?
कभी आप सोचकर देखिए, पूरा देश एक दिन में 76 करोड़ से ज्यादा UPI ट्रांजैक्शन करता है. क्या ये अपने आप काम करता है? नहीं. ये हमारे और आपके लिए फ्री है, लेकिन इसको बेरोकटोक, बिना किसी गड़बड़ी के 24 घंटे 7 दिन चलाए रखने के लिए हजारों करोड़ों रुपये खर्च होते हैं. इसके पीछे हजारों सर्वर चलते हैं, दिन-रात साइबर सिक्योरिटी की टीम काम करती है, फ्रॉड रोकने के लिए AI सिस्टम लगा है, बैंकों के ऐप चलते हैं. सवाल ये है कि UPI को चलाने में इतनी लागत आती क्यों है?
पहली वजह: करोड़ों ट्रांजैक्शन
UPI का इस्तेमाल हर महीने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है. संसद की समिति का अनुमान है कि आने वाले समय में UPI एक महीने में 150 अरब तक ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर सकता है. इसके अलावा करीब 60 करोड़ नए यूजर्स जुड़ने का भी अनुमान है. जितने ज्यादा लोग UPI इस्तेमाल करेंगे, उतना ही बड़ा नेटवर्क चाहिए होगा. सर्वर, पेमेंट प्रोसेसिंग, डेटा सुरक्षा, फ्रॉड डिटेक्शन और टेक्निकल सपोर्ट पर खर्च बढ़ेगा.
दूसरी वजह: साइबर सिक्योरिटी
UPI जितना बड़ा होता जाएगा, साइबर फ्रॉड और डिजिटल अपराधों का जोखिम भी उतना ही बढ़ेगा. इसलिए बैंकों और पेमेंट कंपनियों को लगातार सिक्योरिटी सिस्टम पर निवेश करना पड़ता है. इसके अलावा पेमेंट नेटवर्क को हर समय चालू रखना पड़ता है. इसमें टेक्निकल इंफ्रास्ट्रक्चर, सर्वर क्षमता और नेटवर्क अपग्रेडेशन पर लगातार खर्च होता है.
कौन तय करेगा फीस?
अगर आगे चलकर MDR लागू होता भी है, तो ये फैसला सीधे सरकार नहीं बल्कि UPI और सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी करेगी. ये समिति नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी NPCI की अगुवाई में काम करती है. यही कमेटी तय करेगी कि MDR का पूरा स्ट्रक्चर कैसा होगा और किस सीमा से ऊपर के लेन-देन पर MDR लागू होगा.
सरकार ने अब तक जो कहा है, उससे तो यही लग रहा है कि अगर MDR लगेगा भी, तो वो सिर्फ एक तय सीमा से ऊपर के कुछ चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर ही लागू होगा. ये दर भी काफी कम होगी, डेबिट या क्रेडिट कार्ड पर लगने वाले मौजूदा फीस से कहीं कम होगी.
आम लोगों की जेब पर क्या असर?
ये ऐसा सवाल है जो तबतक बना रहेगा जबतक MDR का नया सिस्टम लागू नहीं हो जाता. हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भरोसा जरूर दिया है कि भविष्य में डिजिटल भुगतान पर लगने वाला कोई भी शुल्क सिर्फ एक सीमित कैटेगरी के उन मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर लागू होगा, जो एक ऊंची सीमा से ज्यादा के होंगे. उन्होंने ये भी साफ किया है कि आम उपभोक्ता पहले की तरह ही UPI फ्री रहेगा, उन पर किसी तरह का कोई चार्ज नहीं लगेगा.
हालांकि कई एक्सपर्ट्स ये कह रहे हैं कि सरकार भले ही बड़े दुकानदारों से फीस वसूलने की बात कर रही है, लेकिन असल में इसका बोझ आएगा तो ग्राहकों पर ही. अब ऐसा न हो, इस दिशा में सरकार क्या करेगी, ये एक बड़ा सवाल है.
तो आखिर में यही कि UPI का फ्री वाला हनीमून पीरियड अब खत्म होने की कगार पर है, सरकार नहीं चाहती कि UPI का इस्तेमाल कम हो, लेकिन वो ये भी नहीं चाहती कि बैंक और पेमेंट कंपनियां घाटे में चली जाएं. इसलिए आने वाले 6 से 12 महीनों में आपको ये देखने को मिल सकता है कि 2000 रुपये से ऊपर के बड़े ऑनलाइन पेमेंट या बड़े स्टोर्स पर UPI पेमेंट का एक छोटा सा हिस्सा फीस के तौर पर कटने लगे, लेकिन इस उम्मीद के साथ कि इसका बोझ दुकानदार आम उपभोक्ताओं पर न डालें.
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