क्या अब पेट्रोल डीजल की कीमतें (Petrol Diesel Pries) कम होने वाली हैं, ये उम्मीद इसलिए जागी है क्योंकि परिस्थितियां ऐसी बन रही हैं. कच्चे तेल की कीमतें (Crude Oil Prices) आज, 3 अगस्त 2026 को 82 डॉलर के नीचे फिसल गईं. आज से ही ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत भी शुरू हो रही है.
अगर ये बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ती है, तो क्रूड की कीमतें और भी नीचे जा सकती हैं, और कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहती हैं तो ये उम्मीद की जा सकती है. इसके अलावा, देश की तीन बड़ी सरकारी ऑयल कंपनियों, इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) के जून तिमाही (Q1 FY27) के नतीजे सामने आए हैं, जिनमें घाटा तो दिखा है, लेकिन एक अच्छी खबर भी छिपी है.
क्रूड की कीमतें अचानक क्यों गिरीं
पिछले हफ्ते शुरू हुए हमलो के बाद कच्चे तेल की कीमतें 91 डॉलर के करीब चली गईं थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 1 अगस्त, शनिवार को जैसे ही ऐलान किया कि वो अब ईरान पर ताज़ा हमले नहीं करेंगे और सोमवार से समझौते को लेकर चर्चा की शुरुआत करेंगे. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी ट्रंप से बातचीत कर हमले को टालने की अपील की थी.
इसी के बाद बाज़ार को उम्मीद बंधी कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से सप्लाई सामान्य हो सकती है, उसके बाद से ही कच्चे तेल की कीमतें गिरने लगीं. ब्रेंट क्रूड 6% टूटकर 82 डॉलर के नीचे चला गया. यानी सिर्फ 1 दिन में 8-9 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट दिखाई दी. आज से शुरू हो रही बातचीत में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर समझौते पर चर्चा होने की उम्मीद है.
इसके पहले 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए थे, जिसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के रास्ते टैंकरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था. होर्मुज से दुनिया की करीब 20% क्रूड ऑयल सप्लाई जाती है. इसलिए तनाव बढ़ते ही क्रूड की कीमतें आसमान छूने लगीं. अप्रैल के अंत तक ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर के पार निकल गया था, और जुलाई के आखिरी हफ्ते में जब एक बार फिर से लड़ाई छिड़ी तो ये 88 डॉलर के ऊपर पहुंच गया था.
तेल कंपनियों का घाटा, अनुमान से कम
जून तिमाही में IOC, BPCL और HPCL को मिलाकर कुल 18,149 करोड़ रुपये का घाटा हुआ. हालांकि पिछले साल की इसी तिमाही में 16,184 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था. ये राहत की बात इसलिए है क्योंकि पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 2 जुलाई को एक अनुमान दिया था, उसके मुकाबले ये घाटा कहीं कम है. पुरी ने तब कहा था कि इन तीनों कंपनियों को जून तिमाही में करीब 74,781 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है.
Q1 में स्टैंडअलोन घाटा/मुनाफा
| OMC | Q1 FY27 (₹Cr) | Q1 FY26 (₹Cr) |
| IOC | -2662 | +5689 |
| BPCL | -3962 | +6124 |
| HPCL | -11526 | + 4371 |
| TOTAL | -18149 | +16184 |
घाटा अनुमान से कम क्यों रहा?
OMCs का घाटा सरकारी अनुमान से कम क्यों रहा, इसके पीछे सबसे ठोस दो वजहें रहीं. जिसने तेल मार्केटिंग कंपनियों पर महंगे क्रूड की वजह से उनके मार्जिन पर पड़ रहे दबाव को काफी हद तक कम किया.
- पहली- मई 2026 में कंपनियों ने रिटेल कीमतों में करीब 8 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की. 15 मई को 3 रुपये और उसके बाद 10 दिन के भीतर लगातार बढ़ोतरी की गई. जिससे मार्जिन पर पड़ रहे दबाव में कुछ राहत मिली.
- दूसरी- 27 मार्च 2026 को सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की. पेट्रोल पर ड्यूटी 13 रुपये से घटाकर 3 रुपये और डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी 10 रुपये से घटाकर जीरो कर दी गई. जिसने कंपनियों को कुछ राहत दी. इसके अलावा LPG की ऊंची कीमतों ने भी घाटे की भरपाई में मदद की.
इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स ये कहते हैं कि शुरुआती बड़ा अनुमान असल में एक तरह की “राजनीतिक तैयारी” थी, ताकि लोग पेट्रोल-डीजल की ऊंची कीमतों के झटके को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सके. दिलचस्प बात यह भी है कि मई में राज्यों के चुनाव खत्म होने के बाद ही सरकार ने कंपनियों के घाटे को लेकर मुखर होना शुरू किया, जबकि चुनावों के दौरान इस मुद्दे पर चुप्पी बनी रही थी.
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पेट्रोल-डीज़ल पर भारी घाटा
संकट के सबसे गंभीर दौर, यानी अप्रैल 2026 में, तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 18 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल पर करीब 25 रुपये प्रति लीटर का रोज़ाना घाटा हो रहा था. इसका मतलब ये हुआ कि कंपनियां हर दिन औसतन 600-700 करोड़ रुपये का नुकसान सिर्फ पेट्रोल-डीज़ल को लागत से कम कीमत पर बेचने की वजह से झेल रही थीं.
अगर सरकार ने मार्च में एक्साइज़ ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती न की होती, तो यह घाटा और भी बड़ा होता. अनुमान के मुताबिक कुल नुकसान करीब 62,500 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता था. उस वक्त सरकार ने टैक्स घटाकर और कंपनियों ने खुद घाटा सहकर, दोनों मिलाकर उस वक्त पेट्रोल पर करीब 24 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल पर करीब 30 रुपये प्रति लीटर का बोझ उठाया था.
तीनों कंपनियों में HPCL को सबसे ज़्यादा चोट पहुंची, जबकि IOC का घाटा सबसे कम रहा. क्योंकि इसे सरकार से LPG अंडर-रिकवरी की भरपाई के तौर पर 3,621 करोड़ रुपये मिले, जिससे कुछ राहत मिली. दिलचस्प बात ये भी है कि तीनों कंपनियों ने अपने कच्चे तेल के प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग में रिकॉर्ड प्रदर्शन किया, यानी घाटा बिक्री की मात्रा में कमी की वजह से नहीं, बल्कि मार्जिन पर पड़े दबा से हुआ.
क्या पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें कम होंगी?
अब जब परिस्थितियां बेहतर दिख रही हैं तो ये सवाल लाज़िमी है कि क्या आम आदमी को पेट्रोल डीजल के महंगे दंश से कुछ राहत मिलेगी. घरेलू कीमतों में कटौती इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतरराष्ट्रीय कीमतें अगले कुछ हफ्तों तक नीचे बनी रहती हैं या नहीं. साथ ही ये भी समझना होगा कि भले ही ग्लोबल क्रूड की कीमतें अभी कम हुई हैं, लेकिन कंपनियां अभी भी वही कच्चा तेल प्रोसेस कर रही हैं जो उन्होंने ऊंची कीमतों पर खरीदा था. क्योंकि कंपनियां आमतौर पर कम से कम दो महीने पहले क्रूड खरीदती हैं.
इसका मतलब है कि भले ही आज क्रूड 82 डॉलर पर आ गया हो, इसका असर आपके शहर के पेट्रोल पंप तक पहुंचने में वक्त लगेगा. साथ ही, कंपनियों को अभी अपने बढ़े हुए कर्ज़ की भी भरपाई करनी है. IOC का डेट-इक्विटी रेश्यो मार्च के 0.54 से बढ़कर जून तक 0.71 हो चुका है, और नेटवर्थ भी घटा है. ऐसे में कंपनियां पहले अपनी बैलेंस शीट मजबूत करना चाहेंगी, उसके बाद ही कीमतों में कोई राहत देने पर विचार होगा.
फिर भी, अगर आज से शुरू हो रही ईरान-अमेरिका बातचीत सफल रहती है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से सप्लाई पूरी तरह सामान्य होती है, तो क्रूड में आगे और गिरावट आ सकती है. तब ये उम्मीद की जा सकती है कि सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत दे सकती है.
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